हरगिज़ न राह पाई फ़र्दा-ओ-दी ने दिल पर
रहती है एक हालत बारह महीने दिल पर
सकते में हैं मह-ओ-मेहर दरिया पड़े हैं बे-बहर
है सख़्त ग़ैर-मौज़ूँ दुनिया ज़मीन-ए-दिल पर
शो'ला चराग़ में है सौदा दिमाग़ में है
साबित क़दम हूँ अब तक दीन-ए-मुबीं-ए-दिल पर
या-अय्योहल-मजाज़ीब है बस-कि ज़ेर-ए-तर्तीब
मजमूअतुल-फ़तावा क़ौल-ए-मतीन-ए-दिल पर
लिख लो ये मेरी राय क्या क्या सितम न ढाए
कल दिल ने आदमी पर आज आदमी ने दिल पर
ये रंज ना-कशीदा ये जेब ना-दरीदा
ऐ इश्क़ रहम हाँ रहम इन तारकीन-ए-दिल पर
मानो ये घर न छोड़ो दुनिया को देखते हो
जो कुछ गुज़र चुकी है इस ना-मकीन-ए-दिल पर
इक सर है ना-कशूदा इक क़ौल ना-शनूदा
इक नग़्मा ना-सरूदा तर्ज़-ए-नवीन-ए-दिल पर
पड़ता है जस्ता जस्ता मद्धम सा और शिकस्ता
इक माह-ए-नीलमीं का परतव नगीन-ए-दिल पर
सौ बार इधर से गुज़रा वो आतिशीं चमन सा
इक बर्ग-ए-गुल न रक्खा दस्त-ए-यमीन-ए-दिल पर
ख़ूँ-बस्ता चश्म-ए-हैराँ पैवस्ता ला'न-गर्दां
बे-दीद बल्कि बे-दर्द बल्कि कमीने दिल पर
तूफ़ान उठा रखा था आँखों ने वाह-वा का
उस की नज़र नहीं थी कल आफ़रीन-ए-दिल पर
रंगीन तो बहुत है दुनिया मगर महाशय
धब्बे से पड़ गए हैं कुछ आस्तीन-ए-दिल पर
वो माह-ए-नाज़नीं है या सर्व-आतिशीं है
या फ़ित्ना-ए-क़यामत बरपा ज़मीन-ए-दिल पर
सब ना-मलामतों को सब बे-करामतों को
सब सर-सलामतों को लाना है दीन-ए-दिल पर
'जावेद' को दिखा कर कहता है सब से दिलबर
ऊधम मचा रखा था इन भाई-जी ने दिल पर
फ़ारूक़ी और अहमद-मुश्ताक़ को तहय्यत
शाख़-ए-ग़मगीन-ए-दिल पर हिस्न-ए-हसीन-ए-दिल पर
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