ज़रा सी रौशनी का ख़ुद पे काबू देख लेते हैं

कि जैसे बुझ रही आँखों से जुगनू देख लेते हैं

जो अपने घर में गुलदस्ता सजा कर रख नहीं सकते
गु़लों के बाग़ में जाते हैं ख़ुशबू देख लेते हैं

तुम्हें हैरान करने की कोई कोशिश नहीं है पर
हम उन के बाज़ुओं में गै़र बाज़ू देख लेते हैं

कहीं इंसान ही पत्थर कहीं पत्थर की मूरत है
कभी घर से निकलते हैं तो जादू देख लेते हैं

बहुत मोती इकट्ठा कर लिए हैं सींप में हम ने
नज़र अच्छी हैं इन
में आप आँसू देख लेते हैं

— Anshika Shukla

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