उसने देखा जो मुस्कुराते हुए
मर गए लोग कसमसाते हुए
मैं वो मजनूँ नहीं जो मर जाऊँ
ख़ाक सहराओं में उड़ाते हुए
आग थी आग और भी भड़की
आग से आग को बुझाते हुए
लाख वादे किए थे उसने भी
जिस्म से जिस्म को दबाते हुए
और फिर दूर हो गए दोनों
दरमियाँ दूरियाँ मिटाते हुए
कितने पुर्ज़े लगे थे याद नहीं
मैं मगन था घड़ी बनाते हुए
और कब तक चलूँ तेरी जानिब
मैं अकेला क़दम बढ़ाते हुए
कब तकल्लुफ़ से चैन पाएगा
तू नए आदमी बनाते हुए
क्या तुझे मैं भी याद आता हूँ
मेरी ग़ज़लों को गुनगुनाते हुए
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