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ज़िंदगी इस तरह गुज़ारी है  - Dheerendra Singh Faiyaz

ज़िंदगी इस तरह गुज़ारी है
सिलसिला ख़त्म साँस जारी है

दर्द ग़म अश्क और मायूसी
तेरी उम्मीद सब पे भारी है

मैं ने ढूँढी तो मुख़्तसर पाई
दुनिया जो दिखती इतनी सारी है

नींद के बाज़ू टूट जाते हैं
ख़्वाब का बोझ इतना भारी है

खेल खेला था उम्र का लेकिन
मौत जीती हयात हारी है

ये नहीं रात का सियह आँचल
ये फ़क़त रात की कनारी है

वक़्त की धूल जम गई थी फिर
उम्र की फिर परत उतारी है

Dheerendra Singh Faiyaz
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