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इश्क़ का भी क़बील होता है  - Dilshad Naseem

इश्क़ का भी क़बील होता है
दर्द दिल का कफ़ील होता है

याद आया न कर नमाज़ों में
मेरा सज्दा तवील होता है

बे-वफ़ाओं के ज़िक्र में तेरा
तज़्किरा बर-सबील होता है

अर्सा-ए-ज़ीस्त तुम ज़रा सोचो
हाए कितना तवील होता है

ऐ शब-ए-ग़म हर एक पल तेरा
मुझ को सदियाँ मसील होता है

अश्क जो इश्क़ ने बहाया वो
आशिक़ों का वकील होता है

तन्हा बे-चारा सा ये मेरा दिल
तेरे बिन अब अलील होता है

Dilshad Naseem
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