0

मेरे दाता तिरे सिवा क्या हो  - Dr. Mohammad Jamal

मेरे दाता तिरे सिवा क्या हो
किसी दरबार से अता क्या हो

ज़िंदगी ज़िंदगी जिसे कहिए
उस से बढ़ कर कोई बला क्या हो

जो किराए के घर बदलते हैं
उन का इक मुस्तक़िल पता क्या हो

माँ जो तेरे लिए उठाए हाथ
उस से बढ़ कर कोई दुआ क्या हो

क़त्ल ग़ारत-गरी-ओ-डाका-ज़नी
इस का अंजाम ऐ ख़ुदा क्या हो

मैं भी मुहताज वक़्त भी नादार
फिर दिया क्या हो और लिया क्या हो

बज़्म में यूँ चले तो जाएँगे
ये बताओ कि मुद्दआ' क्या हो

जब इबारत है ज़िंदगी इस से
दर्द-ए-दिल की कोई दवा क्या हो

बे-रुख़ी वो बरत रहे हैं 'जमाल'
इब्तिदा ये तो इंतिहा क्या हो

Dr. Mohammad Jamal
0

Share this on social media

Miscellaneous Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Dr. Mohammad Jamal

As you were reading Shayari by Dr. Mohammad Jamal

Similar Writers

our suggestion based on Dr. Mohammad Jamal

Similar Moods

As you were reading Miscellaneous Shayari