मुझ को न अब शैतान से डर लगता है

इंसान हूँ इंसान से डर लगता है

किस को ख़बर किस हाथ है ख़ंजर रखा
हर हाथ की पहचान से डर लगता है

जाना कहाँ रुकना कहाँ हैरान हूँ
चलते हुए अंजान से डर लगता है

किस की हँसी का हो भरोसा याँ कि अब
हर शख़्स की मुस्कान से डर लगता है

मैं किस नज़र किस आँख से पर्दा करूँ
अब मुझ को चश्म-ए-जान से डर लगता है

— Jay kishan

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Aankhein Shayari

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