चलता कभी है संग मेरे क़ाफ़िला नहीं

वो चाहिए था मुझ को जो या रब मिला नहीं

मौला उस एक शख़्स से मिलती मुझे ख़ुशी
बाक़ी जहान रख ले तू मुझ को गिला नहीं

उस बे-वफ़ा ने प्यार में धोखा दिया मुझे
ऐसा दिया है ज़ख़्म जो अब तक सिला नहीं

ग़म ही तो है के जिस ने मेरा मान रख लिया
अंगद के पैर जैसे ही ये भी हिला नहीं

माधव फिर एक शख़्स का होना पड़ा मुझे
क्यूँ ख़त्म हो सका कभी ये सिलसिला नहीं

— Murari Mandal

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