किसी के रंज-ओ-ग़म में जो बशर शामिल नहीं होता
वो दुनिया में कभी ताज़ीम के क़ाबिल नहीं होता
मरीज़-ए-इश्क़ से ऐ चारा-गर ये बे-रुख़ी कैसी
किसी बेबस का दिल रखना कोई मुश्किल नहीं होता
निहायत बे-मज़ा होती है वो रूदाद उल्फ़त की
तुम्हारा ज़िक्र जिस रूदाद में शामिल नहीं होता
कोई पूछे मिरे दिल से ज़रा महफ़िल की वीरानी
कभी महफ़िल में जब वो रौनक़-ए-महफ़िल नहीं होता
हक़ीक़त में उन्हीं को ज़िंदगानी रास आती है
वो जिन के वास्ते मरना कोई मुश्किल नहीं होता
सुलूक-ए-दहर का शिकवा कभी करते नहीं वर्ना
सुलूक-ए-दहरस ग़ाफ़िल हमारा दिल नहीं होता
मोहब्बत की कोई मंज़िल नहीं होती ज़माने में
ये वो दरिया है जिस का कोई भी साहिल नहीं होता
तिरी बातों पे ऐ नासेह यक़ीं हम किस तरह कर लें
ये वो बातें हैं जिन बातों से कुछ हासिल नहीं होता
फ़क़त साक़ी का दिल रखने को पी लेता हूँ ऐ 'आसी'
किसी सूरत में वर्ना शामिल-ए-महफ़िल नहीं होता
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