nahin ki apni tabaahi ka raaz ko gham hai | नहीं कि अपनी तबाही का 'राज़' को ग़म है

  - Raaz Yazdani
नहींकिअपनीतबाहीका'राज़'कोग़महै
तुम्हारीज़हमत-ए-अहद-ए-करमकामातमहै
निसार-ए-जल्वादिल-ओ-दींज़रानक़ाबउठा
वोएकलम्हासहीएकलम्हाक्याकमहै
किसीनेचाककियाहैगुलोंकापैराहन
शुआ-ए-मेहरतुझेए'तिमाद-ए-शबनमहै
क़ज़ाकाख़ौफ़हैअच्छामगरइसआफ़तमें
येमो'जिज़ाभीकिहमजीरहेहैंक्याकमहै
वोरक़्स-ए-शो'लावोसोज़-ओ-गुदाज़-ए-परवाना
जिधरचराग़हैंरौशनअजीबआलमहै
हुदूद-ए-दैर-ओ-हरमसेगुज़रचुकाशायद
किअबइजाज़त-ए-सज्दाहैऔरपैहमहै
शमीम-ए-ग़ुन्चा-ओ-गुलरंग-ए-लालानग़्मा-ए-मौज
तिरेजमालकीजोशरहहैवोमुबहमहै
लताफ़तोंसेज़मानाभरापड़ाहैमगर
मिरीनज़रकीज़रूरतसेकिसक़दरकमहै
फ़रेबदिलनेमोहब्बतमेंखाएहैंक्याक्या
हरइकफ़रेबपरअबतकयक़ीन-ए-मोहकमहै
मिरीनिगाहकहाँतकजवाबदेआख़िर
तिरीनिगाहकाहरहरसवालमुबहमहै
अभीतोअपनीनिगाहोंकेइल्तिफ़ातकोरोक
अभीतोमंज़र-ए-हस्तीतमाममुबहमहै
  - Raaz Yazdani
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Nazar Shayari

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