पहले क़ाबिल बनाएँगे ये हाथ
फिर तेरे हाथ पे रखेंगे हाथ
हम ने क्या तेरे दर को खोलना था
बस निशाँ के लिए लगाए हाथ
तू ज़बाँ खोल कुछ क़दम तो उठा
कब तलक यूँ उठेंगे उस के हाथ
चाँद तुझ को पकड़ तो लेते हम
पर वहाँ तक नहीं पहुँचते हाथ
तू ने ही भीड़ को नहीं देखा
वर्ना मैं ने हिलाए तो थे हाथ
तुम भी ले आओ कुछ हया ख़ुद में
हम ही कब तक धरेंगे आँख पे हाथ
मान ले है जुदाई क़िस्मत में
छोड़ दे अब दिखाने अपने हाथ
जब ज़रूरत है तो अकेले हैं
क्या करें था
में ही पराए हाथ
याद बे-होशी की वो ही है मुझे
जब जबीं पे रखा था माँ ने हाथ
— Rajnishwar Chauhan 'Rajnish'















