सुनो ख़्वाब सारे मिटाए ग़रीबी
ग़रीबों को बेहद सताए ग़रीबी
कभी ज़िंदगी में जो देखा नहीं दिन
वो दिन भी सभी को दिखाए ग़रीबी
ज़मानें में उन की क़दर ही नहीं है
ख़ुद्दारों का सर भी झुकाए ग़रीबी
भले चाहते हो किसी को भी कितना
मोहब्बत भी सब से छुड़ाए ग़रीबी
जहाँ दुख सुनाएँ दिलासे ही पाएँ
भरी आँख को भी सुखाए ग़रीबी
— Sandeep Gandhi Nehal















