उम्र गुज़री तेरा चेहरा देखते
वक़्त जो होता तो दुनिया देखते
देखते तुम मेरी नज़रों से अगर
और भी तुम ख़ुद को गहरा देखते
शक्ल आईने में भी तेरी ही थी
इस से आगे तुझ को कितना देखते
ज़िम्मेदारी बीच में आती न तो
तुम मेरे अंदर का मिर्ज़ा देखते
हम थे दीवाने नज़र मंज़िल पे थी
होश में होते तो रस्ता देखते
ज़िन्दगी ने यूँँ लिखी मेरी ग़ज़ल
रो पड़े सब इस का मक़्ता देखते
Read Full