ज़िंदगी भर एक लम्हे का असर चलता रहा
मैं वहीं पर रुक गया था और सफ़र चलता रहा
धड़कनें तो रुक गई थीं मैं मगर चलता रहा
ज़िंदगी जीने का नाटक उम्र भर चलता रहा
ख़्वाब तोड़े नींद ने या नींद तोड़ी ख़्वाब ने
सोचता हूँ कौन किस को तोड़कर चलता रहा
आँसुओं को क़ैद रक्खा ग़म सुख़न में बाँधकर
ग़म नए मिलते रहे और ये हुनर चलता रहा
ख़त्म हो जाएगी दुनिया ऐ ख़ुदा तू देखना
नाम पर मज़हब के ये झगड़ा अगर चलता रहा
— sourabh meena















