दो ही काम थे रोते थे पछताते थे
बस ये ही कर पाते थे पछताते थे
अपनी बढिया कटती थी सहराओं में
दिन भर ख़ाक़ उड़ाते थे पछताते थे
पछताने से हासिल क्या होना था
बस अपना ख़ून जलाते थे पछताते थे
— Vashu Pandey
बस ये ही कर पाते थे पछताते थे
अपनी बढिया कटती थी सहराओं में
दिन भर ख़ाक़ उड़ाते थे पछताते थे
पछताने से हासिल क्या होना था
बस अपना ख़ून जलाते थे पछताते थे
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