Ahmad Fakhir
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हिकायतें ही नहीं लिक्खीं आग की हम ने
हक़ीक़तें भी ब-रंग-ए-ख़लील लिखते रहे
जो क़ल्ब-ओ-जाँ में है ख़ुश्बू किसी की ज़ुल्फ़ों की
उसी को अपनी मता-ए-जलील लिखते रहे
रही ये आस कि सैराब होगी किश्त-ए-हयात
सो जौहड़ों को भी दरिया-ए-नील लिखते रहे
निकल सकी न वहाँ एक बूँद भी 'फ़ाख़िर'
तमाम-उम्र जिन आँखों को झील लिखते रहे
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मौजों के इज़्तिराब ने धड़का दिया था दिल
उतरे जो हम उतर गया दरिया अजीब है
दुश्वार हो गई है अब अपनी शनाख़्त भी
आईना कह रहा है कि चेहरा अजीब है
शाख़ें जो मेरे सहन में हैं उन में फल न आए
हम साए का दरख़्त भी कितना अजीब है
उठती है इक फ़सील तो गिरती है इक फ़सील
'फ़ाख़िर' ये चाहतों का घरौंदा अजीब है
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इस जहाँ से भी तो इक रोज़ निकलना होगा
ये जहाँ भी तो किराए का मकाँ लगता है
अश्क-ए-ग़म आँख में आ जाते हैं रोकें कैसे
आग जलती है तो आँखों में धुआँ लगता है
जाने क्या मेरी समाअ'त को हुआ है 'फ़ाख़िर'
नग़्मा-ए-ऐश भी सुनिए तो फ़ुग़ाँ लगता है
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मौसम तो बदलता है बदल जाए तो क्या हो
फूलों से जो ख़ुश्बू भी निकल जाए तो क्या हो
फूलों से जो ख़ुश्बू भी निकल जाए तो क्या हो
जाता हूँ कड़ी धूप में परछाईं के हमराह
सहरा में ये परछाईं भी जल जाए तो क्या हो
ये मश्वरा-ए-ज़ब्त भी तस्लीम है लेकिन
आँसू मिरी आँखों से निकल जाए तो क्या हो
महताब सहारा है शब-ए-ज़ीस्त का 'फ़ाख़िर'
ये ज़र्द सा महताब भी ढल जाए तो क्या हो
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जिस शख़्स को देखो वही सरगर्म-ए-सफ़र है
दुनिया कहीं वीरान न हो जाए ये डर है
दुनिया कहीं वीरान न हो जाए ये डर है
लाएगी कभी रंग हवाओं की मोहब्बत
हम जिस में बसर करते हैं वो रेत का घर है
सहरा में किसी साए की उम्मीद न टूटी
हसरत की निगाहों में बगूला भी शजर है
निकली है गुमानों से यही शक्ल यक़ीं की
जिस सम्त उड़े गर्द वही राह-गुज़र है
महताब तो निकला ही नहीं डूब के 'फ़ाख़िर'
लेकिन मिरे दरिया में वही मद्द-ओ-जज़र है
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ज़ुल्फ़ उस की हो रही थी परेशाँ हवाओं में
हम ये समझ रहे थे दुआ ने असर किया
पूछो न किस तरह से गुज़ारी है ज़िंदगी
मद्धम से इक दिए ने हवा में सफ़र किया
'फ़ाख़िर' गुज़र रहे हैं हम इस दौर से यहाँ
जिस ने मोहब्बतों को भी मरहून-ए-ज़र किया
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अब चाँद नहीं कोई सितारा नहीं कोई
शब इतनी अँधेरी है कि निकला नहीं कोई
शब इतनी अँधेरी है कि निकला नहीं कोई
हर-चंद नज़र आती है दीवार-ए-तमन्ना
चाहें कि ठहर जाएँ तो साया नहीं कोई
चेहरों को ये ग़म है कोई आईना नहीं है
आईना तरसता है कि चेहरा नहीं कोई
जिस से भी मिलो देख के रह जाता है मुँह को
ऐसा भी नहीं है कि शनासा नहीं कोई
अरमान तुम्हें फ़स्ल-ए-गुलिस्ताँ का है 'फ़ाख़िर'
शाख़ों पे यहाँ फूल तो खिलता नहीं कोई
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चाँदनी जिस की दर-ए-जाँ पे हम अक्सर देखें
कभी उस चाँद को भी हाथ से छू कर देखें
कभी उस चाँद को भी हाथ से छू कर देखें
कैसे भर लें दर-ओ-दीवार पे आवेज़ाँ हैं
जिस तरफ़ देखें तिरी याद का मंज़र देखें
कभी बारिश की भी रातों में न चमकी बिजली
यही अरमान रहा घर को मुनव्वर देखें
आँख खुल जाए तो सहरा की ज़मीं पर हों क़दम
नींद आ जाए तो ख़्वाबों में समुंदर देखें
टूट जाने का भी इम्कान बहुत है इस में
यूँ कमानों की तरह आप न खिंच कर देखें
शाम होते ही निकल आते हैं तारे 'फ़ाख़िर'
इक सितारे का मगर रास्ता शब-भर देखें
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