Akhlaque Bandvi

Akhlaque Bandvi

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Akhlaque Bandvi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Akhlaque Bandvi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
वही है गर्दिश-ए-दौराँ वही लैल-ओ-नहार अब भी
रहा करता है रोज़-ओ-शब किसी का इंतिज़ार अब भी

कभी दिन भर तिरी बातें कभी यादों भरी रातें
तिरी फ़ुर्क़त में जीने के बहाने हैं हज़ार अब भी

तिरा जल्वा जो पा जाती चमन में जा के इठलाती
भिकारन बन के बैठी है तिरे दर पर बहार अब भी

ख़ुशी हर-चंद है तारी गई ग़म की गिराँ-बारी
छलक जाती हैं आँखें आदतन बे-इख़्तियार अब भी

हुए हैं मुंतशिर वर्ना सितमगर तुम से क्या डरना
हमारी ठोकरों में है तुम्हारा इक़्तिदार अब भी

अगर 'अख़लाक़' से मिलते मोहब्बत के चमन खिलते
न बनती बज़्म-ए-याराँ एक गाह-ए-कार-ज़ार अब भी
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Akhlaque Bandvi
किसी के रू-ए-ग़म-ज़दा पे जब कभी नज़र गई
ये मेरा दिल तड़प उठा या मेरी आँख भर गई

हमारी उम्र-ए-रफ़्ता क्या मलूल क्या शगुफ़्ता क्या
भली थी या बुरी थी जो गुज़र गई गुज़र गई

वफ़ा के एक मोड़ पर गया था कोई छोड़ कर
हयात जैसे बस उसी मक़ाम पर ठहर गई

कमाल ख़द्द-ओ-ख़ाल थे सियह ख़मीदा बाल थे
वो तमकनत ऐ साहिब-ए-जमाल अब किधर गई

जो राह-रौ हैं कम-नज़र सफ़र भी उन का क्या सफ़र
वही है उन की हद जहाँ तक उन की रहगुज़र गई

बला की सख़्त जान थी ज़मीं पे आसमान थी
वही ये क़ौम है अदू की सरज़निश से मर गई

उजड़ गया था गुल्सिताँ ब-दस्त-ए-मौसम-ए-ख़िज़ाँ
सो फिर बहार आ गई कली कली सँवर गई
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Akhlaque Bandvi
न गुल ख़ंदाँ न बुलबुल नग़्मा-ख़्वाँ है
अरे गुलचीं ये नज़्म-ए-गुलसिताँ है

चमन में फिर बनाता हूँ नशेमन
सुना है मुज़्महिल बर्क़-ए-तपाँ है

जिसे कहते थे हम सोने की चिड़िया
ये भारत क्या वही हिन्दोस्ताँ है

सदा आती है पैहम ठोकरों से
ये संग-ए-रहगुज़र मंज़िल-रसाँ है

ग़लत सम्त-ए-सफ़र का है ये हासिल
न जादा है न मंज़िल का निशाँ है

मुझे तार-ए-शब-ए-फ़ुर्क़त का ग़म क्या
बहम इक शम्अ'-ए-याद-ए-रफ़्तगाँ है

सुनाएँ किस को हाल-ए-दिल हम अपना
न महरम है न कोई राज़-दाँ है

तिरी यादों का मौसम है नज़र में
कहीं सहरा में इक दरिया रवाँ है
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Akhlaque Bandvi
मैं ज़ेर-ए-साया कहीं महव-ए-ख़्वाब था भी नहीं
कि आ के धूप जगाती मैं जागता भी नहीं

हरीम-ए-नाज़ मिरी दस्तरस से दूर तो है
मिरे जहान-ए-तख़य्युल से मावरा भी नहीं

यही है अद्ल तो ऐसे निज़ाम-ए-अद्ल पे ख़ाक
है फ़र्द-ए-जुर्म भी आएद मिरी ख़ता भी नहीं

हम अपनी जान के दुश्मन को अपना दोस्त कहें
हमारे पास कोई और रास्ता भी नहीं

हम आ के अपने घरों में सुकूँ से बैठ गए
बईं-हमा कोई ख़तरा अभी टला भी नहीं

कहाँ पे लाई है ये शब-गज़ीदगी हम को
चराग़ बुझ भी गए मुश्तइ'ल हवा भी नहीं

असा को डाल दें दरिया में रास्ता हो जाए
हमारे पास कोई ऐसा मो'जिज़ा भी नहीं

इसी जहान में 'अख़लाक़' ऐसे लोग भी हैं
जो नेक भी हैं और उन का कोई ख़ुदा भी नहीं
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Akhlaque Bandvi
यहाँ भी तू है वहाँ भी तू है कहाँ नहीं है किधर नहीं है
न फिर भी देखे जो तेरा जल्वा वो शख़्स अहल-ए-नज़र नहीं है

वो कअ'र-ए-दरिया हो या किनारा हर एक जा मैं ने छान मारा
मिज़ा पे लर्ज़ां सरिश्क जैसा कहीं भी कोई गुहर नहीं है

बदन अगरचे जवाँ जवाँ है रगों के अंदर लहू रवाँ है
फ़ुज़ूल सब है जो बहर-ए-दिल में ज़ुहूर-ए-मद्द-ओ-जज़र नहीं है

हुज़ूर चलिए सँभल सँभल के क़दम ज़रा और हल्के हल्के
ख़याल रखिए ये मेरा दिल है ये आप की रहगुज़र नहीं है

गई बहारों के राग छेड़ो ख़िज़ाँ रुतों की परत उधेड़ो
तुम्हारी बज़्म-ए-तरब में साक़ी अभी मिरी चश्म-ए-तर नहीं है

मैं अपना हर काम अपनी हद में बड़े तयक़्क़ुन से कर रहा हूँ
मिरी लुग़त के किसी वरक़ पर अगर नहीं है मगर नहीं

अभी तलक उस के रू-ए-ज़ेबा पे मेरी नज़रें टिकी हुई हैं
उसे भी है ये गुमान-ए-ग़ालिब कि आइने को ख़बर नहीं है

जो बद-चलन था ज़माने भर का वही फ़ज़ीलत-मआ'ब ठहरा
उसी को दस्तार दी गई है कि जिस के शाने पे सर नहीं है

कभी जो घर से सफ़र पे निकलो ये बात क़िर्तास-ए-दिल पे लिख लो
कि हर शरीक-ए-सफ़र हमारा हक़ीक़तन हम-सफ़र नहीं है

इसी में 'अख़लाक़' उम्र भर की मसाफ़तों का है राज़ पिन्हाँ
ये एक लम्हा जो वस्ल का है ये साअ'त-ए-मुख़्तसर नहीं है
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Akhlaque Bandvi
किसी हिकमत किसी तदबीर से बाहर निकले
पाँव इक बार तो ज़ंजीर से बाहर निकले

यूँ हमाइल हुई कल शाम तिरी याद कि हम
सुब्ह-दम नाला-ए-शब-गीर से बाहर निकले

इश्क़ में शहद है इस राज़ से पर्दा उट्ठा
लोग जब बू-ए-मुग़ाफ़ीर से बाहर निकले

आज फिर बख़्त ने दरवाज़े पे दस्तक दी थी
आज भी हम ज़रा ताख़ीर से बाहर निकले

उस की जा वो नहीं दीवार ये अपना दिल है
उस से कह दे कोई तस्वीर से बाहर निकले

हिज्र का ग़म भी नहीं वस्ल की ख़्वाहिश भी नहीं
ले मोहब्बत तिरी जागीर से बाहर निकले

कुछ मज़ा आया है जीने का हमें भी 'अख़लाक़'
जब गुज़रगाह-ए-दसातीर से बाहर निकले
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Akhlaque Bandvi
शजर पे साँप है या बाग़ में शिकारी है
ये कैसी आज परिंदों में बे-क़रारी है

तुम्हारे लब पे थीं कल इंक़लाब की बातें
तुम्हारे लब पे तो गिर्या है आह-ओ-ज़ारी है

अजब न था सफ़-ए-अव्वल में हम नज़र आते
मगर ये राह में हाइल जो ख़ाकसारी है

ये मा'रके तो सियासत के शाख़साने हैं
न तू ने जीती है बाज़ी न मैं ने हारी है

कोई गुज़ारे तो दो दिन में जान से गुज़रे
जो उम्र हम ने ग़म-ए-यार में गुज़ारी है

हमारे हाल पे उन की इनायतें कम थीं
जो दिल पे अब के लगा है वो ज़ख़्म कारी है

कुछ ऐसे नाम हैं शेर-ओ-सुख़न की दुनिया में
कि जिन की धूम हक़ीक़त में इश्तिहारी है
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Akhlaque Bandvi
मर ही जाए मबादा अजल
ना-समझ आइने से निकल

ज़िंदगी के मसाइल का हल
वक़्त के साथ ख़ुद को बदल

तेरी मंज़िल अभी दूर है
ऐ मुसाफ़िर ज़रा तेज़ चल

याद आई भी उस की तो कब
मुर्तइश हाथ हैं पाँव शल

ठोकरें तो हैं मंज़िल-रसाँ
ख़ौफ़ से रास्ते मत बदल

आज फिर तू उठा देर से
तोस खा चाय पी हाथ मल

तेरी यादों की यलग़ार है
जीना दुश्वार है आज-कल

क्या अदावत में पास-ए-अदब
क्या मोहब्बत में मौक़ा महल

चश्म-ए-नम दिल की ग़म्माज़ है
मुस्कुरा कर न लहजा बदल

शाम होने को है मुंजमिद
मुतरिबा छेड़ कोई ग़ज़ल
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Akhlaque Bandvi
शाम तक ऐसा थकन से चूर हो जाता हूँ मैं
जिस्म से बानू-ए-शब काफ़ूर हो जाता हूँ मैं

तेरे जल्वों से कभी जब दूर हो जाता हूँ मैं
अपनी आँखों के लिए बे-नूर हो जाता हूँ मैं

लोग हो जाते हैं वामिक़ लोग हो जाते हैं क़ैस
इंतिहा-ए-इश्क़ में मंसूर हो जाता हूँ मैं

चाहता तो हूँ करूँ ख़ल्क़-ए-जहाँ पर ग़ौर-ओ-ख़ौज़
दर-गुज़र ऐ रब्ब-ए-कुल मसहूर हो जाता हूँ मैं

जब भी सुनता हूँ ज़बान-ए-ग़ैर से अपनी सिफ़ात
सच कहूँ थोड़ा बहुत मग़रूर हो जाता हूँ मैं

मेरी आँखें कर रही होती हैं जब दीदार-ए-यार
अपने पैकर में सरापा तूर हो जाता हूँ मैं

शहर में साहिब बना फिरता हूँ किस किस रंग से
गाँव जा कर फिर वही मज़दूर हो जाता हूँ मैं

मिल ही जाती है हिसार-ए-दर्द से मुझ को नजात
फिर हिसार-ए-दर्द में महसूर हो जाता हूँ मैं

आदमी 'अख़लाक़' मैं अच्छा हूँ इस में शक नहीं
हाँ कभी हालात से मजबूर हो जाता हूँ मैं
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Akhlaque Bandvi
डोरे डाले लाल परी है आँखों में
सो भी जाओ नींद भरी है आँखों में

फिर मय्यत के बार से पलकें बोझल हैं
फिर कोई उम्मीद मिरी है आँखों में

दीदा-वरी के सब क़िस्से उन से मंसूब
अपनी सर्वत-ए-कम-नज़री है आँखों में

आँखों में कटती है शब वो क्या जानें
बे-ख़बरी सी बे-ख़बरी है आँखों में

एक नज़र में दिल का सब आज़ार गया
यार ग़ज़ब की चारागरी है आँखों में

दिल का ताइर अब भी नग़्मे गाता है
शायद कोई शाख़ हरी है आँखों में

चार हुईं तो रस्ते की दीवार हुईं
क्या नज़रों की राहबरी है आँखों में

नींद में भी उन की पलकें वा रहती हैं
जाने किस की मुंतज़री है आँखों में

मेरी राहत मेरा हज़ मेरा आराम
सारी दौलत तू ने धरी है आँखों में
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Akhlaque Bandvi
रोज़-ए-रौशन को जो निस्बत है सियह रात के साथ
उस ने रिश्ता वही रखा है मिरी ज़ात के साथ

कुछ न था बख़्त में नाकाम मोहब्बत के सिवा
ज़िंदगी काट दी मैं ने इसी सौग़ात के साथ

शब की शब एक चराग़ाँ का समाँ रहता है
शाम आ जाती है जब तेरे ख़यालात के साथ

अब्र-ए-ग़म दिल से उठे अज़-सर-ए-मिज़्गाँ बरसे
चश्म-ए-गिर्यां को अजब रब्त है बरसात के साथ

कर्ब यादों का रहा दर्द भुलाने का रहा
रंज क्या क्या न सहे गर्दिश-ए-हालात के साथ

शैख़ जी आप ने दर-बंदगी सज्दे ही गिने
दिल की ततहीर भी लाज़िम थी इबादात के साथ

मुतरिबा कौन सुने है तिरी चीख़ों की सदा
लब-ए-ल'अलीं पे थिरकते हुए नग़्मात के साथ

और तो काम सभी हो गए पूरे 'अख़लाक़'
दिल-लगी रह गई इक मर्ग-ए-मुफ़ाजात के साथ
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Akhlaque Bandvi
फ़ौजियों के सर तो दुश्मन के सिपाही ले गए
हाथ जो क़ीमत लगी ज़िल्ल-ए-इलाही ले गए

जुर्म मेरा सिर्फ़ इतना था कि मैं मुजरिम न था
क़ैद तक मुझ को सुबूत-ए-बे-गुनाही ले गए

अब वही दुनिया में ठहरे अम्न-ए-आलम के अमीं
जो अमाँ की जा तक असबाब-ए-तबाही ले गए

शिकवा-ए-जलवा-नुमाई सिर्फ़ उन के लब पे है
जो तिरी महफ़िल में अपनी कम-निगाही ले गए

तुम हरम से ले गए शब की सियाही और हम
मय-कदे से भी ज़िया-ए-सुब्ह-गाही ले गए

मैं इधर 'अख़लाक़' की तक़्सीम में मसरूफ़ था
लोग उधर मेरी अदा-ए-कज-कुलाही ले गए
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Akhlaque Bandvi
अभी अश्कों में ख़ूँ शामिल नहीं है
मोहब्बत का जुनूँ कामिल नहीं है

ज़माने से मोहब्बत का अभी तक
ये हासिल है कि कुछ हासिल नहीं है

न आँखें फोड़ इस दश्त-ए-जुनूँ में
ये राह-ए-नाक़ा-ए-महमिल नहीं है

ज़मीं पर बैठ जा ऐ शैख़ तू भी
ये बज़्म-ए-मय तिरी महफ़िल नहीं है

तबीबों से कहो घर लौट जाएँ
ये दर्द-ए-दिल वो दर्द-ए-दिल नहीं है

हमीं 'अख़लाक़' उस से बे-ख़बर हैं
किसी पल हम से वो ग़ाफ़िल नहीं है
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Akhlaque Bandvi
चर्ख़ भी छू लें तो जाना है इसी मिट्टी में
मुस्तक़िल अपना ठिकाना है इसी मिट्टी में

जिन के दामन पे कभी चांद-सितारे चमके
दफ़न उन का भी फ़साना है इसी मिट्टी में

बे-अमल हाथ लगाए भी तो ख़ाली जाए
हाँ जफ़ा-कश का ख़ज़ाना है इसी मिट्टी में

इस तरह चल कि ये पामाल न होने पाए
बे-ख़बर आब है दाना है इसी मिट्टी में

हम-वतन ख़ाक-ए-वतन क्यूँ न हो प्यारी कि हमें
बा'द-अज़-मर्ग भी जाना है इसी मिट्टी में

लोग कल कह के तुझे याद करेंगे 'अख़लाक़'
शाइ'र-ए-फ़ख़्र-ए-ज़माना है इसी मिट्टी में
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Akhlaque Bandvi
मुझ से मत पूछ मिरा हाल-ए-दरूँ रहने दे
सुन के टपकेगा तिरी आँखों से ख़ूँ रहने दे

फ़स्ल-ए-गुल दश्त-ए-ख़िरद में है अगरचे मौजूद
मुझ को पा-बस्ता-ए-ज़ंजीर-ए-जुनूँ रहने दे

तू करम मुझ पे करेगा तो जताएगा ज़रूर
हाल जो मेरा ज़ुबूँ है तो ज़ुबूँ रहने दे

सादगी सी कोई ज़ीनत नहीं होती जानाँ
अपनी इन शोख़ अदाओं का फ़ुसूँ रहने दे

छेड़ कर फिर वही माज़ी के पुराने क़िस्से
मुझ से मत छीन मिरे दिल का सुकूँ रहने दे

ऐ ज़माना मैं तिरे साथ बदलने से रहा
अब मैं अच्छा कि बुरा जैसा भी हूँ रहने दे
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Akhlaque Bandvi
फ़लक से चाँद चमन से गुलाब ले आए
कहाँ से कोई तुम्हारा जवाब ले आए

हज़ार रंग हैं हुस्न-ओ-जमाल के लेकिन
वो रंग और है जिस को शबाब ले आए

अजीब तुर्फ़ा-तमाशा है ज़िंदगी मेरी
ख़ुशी भी आए तो ग़म बे-हिसाब ले आए

तिरे ख़मीर में शामिल है गुमरही वर्ना
फ़लक से कितने पयम्बर किताब ले आए

इधर वो तिश्ना-लबी है कि जाँ-ब-लब हैं हम
उधर वो दस्त-ए-करम पर सराब ले आए

उसी की आज भी रहती हैं मुंतज़िर आँखें
जो आ भी जाए तो सद इज़्तिराब ले आए

ये शेर-गोई है 'अख़लाक़' कोई खेल नहीं
करे वो मश्क़ जो छलनी में आब ले आए
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Akhlaque Bandvi
मैं परेशाँ हूँ मिलें चंद निवाले कैसे
उस को दौलत वो मिली है कि सँभाले कैसे

उँगलियाँ अपनी नगीनों से सजाने वाले
तुझ को लगते हैं मिरे हाथ के छाले कैसे

इल्म से फेर लीं तू ने जो निगाहें अपनी
फिर तिरे ज़ेहन में फूटेंगे उजाले कैसे

देखते रह गए पानी की रवानी हम लोग
रास्ते लोगों ने दरिया में निकाले कैसे

उम्र लग जाती है इक घर को बनाने में हमें
मकड़ियाँ रोज़ ही बुन लेती हैं जाले कैसे

तू ने 'अख़लाक़' क़सम खाई थी ज़ब्त-ए-ग़म की
फिर ये पलकों पे नमी होंटों पे नाले कैसे
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कभी जो आँखों में पल-भर को ख़्वाब जागते हैं
तो फिर महीनों मुसलसल अज़ाब जागते हैं

किसी के लम्स की तासीर है कि बरसों बा'द
मिरी किताबों में अब भी गुलाब जागते हैं

बुराई कुछ तो यक़ीनन है बे-हिजाबी में
मगर वो फ़ित्ने जो ज़ेर-ए-नक़ाब जागते हैं

सितम-शिआ'रों हमारा तुम इम्तिहान न लो
हमारे सब्र से सद इंक़लाब जागते हैं

हमें ख़ुद अपनी समाअ'त पे शरम आती है
कि मिम्बरों से अब ऐसे ख़िताब जागते हैं

ये नींद लेती है 'अख़लाक़' वो ख़िराज कि बस
जो ख़ूब सोते हैं हो कर ख़राब जागते हैं
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Akhlaque Bandvi
इधर चराग़ जल गए उधर चराग़ जल गए
जिधर जिधर उठी तिरी नज़र चराग़ जल गए

ये और बात रात भर का तय न कर सके सफ़र
मगर ये कम नहीं कि वक़्त पर चराग़ जल गए

हवा का ऐसा ज़ोर था कि इक बला का शोर था
इसी फ़ज़ा में जो थे बा-हुनर चराग़ जल गए

है बात यूँ तो रात की मगर न एहतियात की
तो क्या करोगे दफ़अ'तन अगर चराग़ जल गए

जो साथ सुब्ह से चले वो सारे लोग दिन ढले
उसी तरफ़ को हो लिए जिधर चराग़ जल गए

वो तीरगी का जाल था कि अब सफ़र मुहाल था
हुआ ये तेरे नाम का असर चराग़ जल गए
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Akhlaque Bandvi
अश्क आँखों में भरे बैठे हो
कितने बुज़दिल हो डरे बैठे हो

तुम को मर कर भी कहाँ मरना था
ज़िंदगी में ही मरे बैठे हो

कुफ़्र बेताब है बैअत के लिए
और तुम हो कि परे बैठे हो

मा'रके यूँ कहीं सर होते हैं
हाथ पर हाथ धरे बैठे हो

जो थे खोटे वो सभी चल निकले
और तुम हो के खरे बैठे हो

आ गया कौन तुम्हें याद 'अख़लाक़'
इस क़दर ग़म से भरे बैठे हो
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