किसी के रू-ए-ग़म-ज़दा पे जब कभी नज़र गई
ये मेरा दिल तड़प उठा या मेरी आँख भर गई
ये मेरा दिल तड़प उठा या मेरी आँख भर गई
हमारी उम्र-ए-रफ़्ता क्या मलूल क्या शगुफ़्ता क्या
भली थी या बुरी थी जो गुज़र गई गुज़र गई
वफ़ा के एक मोड़ पर गया था कोई छोड़ कर
हयात जैसे बस उसी मक़ाम पर ठहर गई
कमाल ख़द्द-ओ-ख़ाल थे सियह ख़मीदा बाल थे
वो तमकनत ऐ साहिब-ए-जमाल अब किधर गई
जो राह-रौ हैं कम-नज़र सफ़र भी उन का क्या सफ़र
वही है उन की हद जहाँ तक उन की रहगुज़र गई
बला की सख़्त जान थी ज़मीं पे आसमान थी
वही ये क़ौम है अदू की सरज़निश से मर गई
उजड़ गया था गुल्सिताँ ब-दस्त-ए-मौसम-ए-ख़िज़ाँ
सो फिर बहार आ गई कली कली सँवर गई
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चमन में फिर बनाता हूँ नशेमन
सुना है मुज़्महिल बर्क़-ए-तपाँ है
जिसे कहते थे हम सोने की चिड़िया
ये भारत क्या वही हिन्दोस्ताँ है
सदा आती है पैहम ठोकरों से
ये संग-ए-रहगुज़र मंज़िल-रसाँ है
ग़लत सम्त-ए-सफ़र का है ये हासिल
न जादा है न मंज़िल का निशाँ है
मुझे तार-ए-शब-ए-फ़ुर्क़त का ग़म क्या
बहम इक शम्अ''-ए-याद-ए-रफ़्तगाँ है
सुनाएँ किस को हाल-ए-दिल हम अपना
न महरम है न कोई राज़-दाँ है
तिरी यादों का मौसम है नज़र में
कहीं सहरा में इक दरिया रवाँ है
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यहाँ भी तू है वहाँ भी तू है कहाँ नहीं है किधर नहीं है
न फिर भी देखे जो तेरा जल्वा वो शख़्स अहल-ए-नज़र नहीं है
न फिर भी देखे जो तेरा जल्वा वो शख़्स अहल-ए-नज़र नहीं है
वो कअ'र-ए-दरिया हो या किनारा हर एक जा मैं ने छान मारा
मिज़ा पे लर्ज़ां सरिश्क जैसा कहीं भी कोई गुहर नहीं है
बदन अगरचे जवाँ जवाँ है रगों के अंदर लहू रवाँ है
फ़ुज़ूल सब है जो बहर-ए-दिल में ज़ुहूर-ए-मद्द-ओ-जज़र नहीं है
हुज़ूर चलिए सँभल सँभल के क़दम ज़रा और हल्के हल्के
ख़याल रखिए ये मेरा दिल है ये आप की रहगुज़र नहीं है
गई बहारों के राग छेड़ो ख़िज़ाँ रुतों की परत उधेड़ो
तुम्हारी बज़्म-ए-तरब में साक़ी अभी मिरी चश्म-ए-तर नहीं है
मैं अपना हर काम अपनी हद में बड़े तयक़्क़ुन से कर रहा हूँ
मिरी लुग़त के किसी वरक़ पर अगर नहीं है मगर नहीं
अभी तलक उस के रू-ए-ज़ेबा पे मेरी नज़रें टिकी हुई हैं
उसे भी है ये गुमान-ए-ग़ालिब कि आइने को ख़बर नहीं है
जो बद-चलन था ज़माने भर का वही फ़ज़ीलत-मआ'ब ठहरा
उसी को दस्तार दी गई है कि जिस के शाने पे सर नहीं है
कभी जो घर से सफ़र पे निकलो ये बात क़िर्तास-ए-दिल पे लिख लो
कि हर शरीक-ए-सफ़र हमारा हक़ीक़तन हम-सफ़र नहीं है
इसी में 'अख़लाक़' उम्र भर की मसाफ़तों का है राज़ पिन्हाँ
ये एक लम्हा जो वस्ल का है ये साअ'त-ए-मुख़्तसर नहीं है
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यूँ हमाइल हुई कल शाम तिरी याद कि हम
सुब्ह-दम नाला-ए-शब-गीर से बाहर निकले
इश्क़ में शहद है इस राज़ से पर्दा उट्ठा
लोग जब बू-ए-मुग़ाफ़ीर से बाहर निकले
आज फिर बख़्त ने दरवाज़े पे दस्तक दी थी
आज भी हम ज़रा ताख़ीर से बाहर निकले
उस की जा वो नहीं दीवार ये अपना दिल है
उस से कह दे कोई तस्वीर से बाहर निकले
हिज्र का ग़म भी नहीं वस्ल की ख़्वाहिश भी नहीं
ले मोहब्बत तिरी जागीर से बाहर निकले
कुछ मज़ा आया है जीने का हमें भी 'अख़लाक़'
जब गुज़रगाह-ए-दसातीर से बाहर निकले
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तुम्हारे लब पे थीं कल इंक़लाब की बातें
तुम्हारे लब पे तो गिर्या है आह-ओ-ज़ारी है
अजब न था सफ़-ए-अव्वल में हम नज़र आते
मगर ये राह में हाइल जो ख़ाकसारी है
ये मा'रके तो सियासत के शाख़साने हैं
न तू ने जीती है बाज़ी न मैं ने हारी है
कोई गुज़ारे तो दो दिन में जान से गुज़रे
जो उम्र हम ने ग़म-ए-यार में गुज़ारी है
हमारे हाल पे उन की इनायतें कम थीं
जो दिल पे अब के लगा है वो ज़ख़्म कारी है
कुछ ऐसे नाम हैं शेर-ओ-सुख़न की दुनिया में
कि जिन की धूम हक़ीक़त में इश्तिहारी है
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डोरे डाले लाल परी है आँखों में
सो भी जाओ नींद भरी है आँखों में
सो भी जाओ नींद भरी है आँखों में
फिर मय्यत के बार से पलकें बोझल हैं
फिर कोई उम्मीद मिरी है आँखों में
दीदा-वरी के सब क़िस्से उन से मंसूब
अपनी सर्वत-ए-कम-नज़री है आँखों में
आँखों में कटती है शब वो क्या जानें
बे-ख़बरी सी बे-ख़बरी है आँखों में
एक नज़र में दिल का सब आज़ार गया
यार ग़ज़ब की चारागरी है आँखों में
दिल का ताइर अब भी नग़्में गाता है
शायद कोई शाख़ हरी है आँखों में
चार हुईं तो रस्ते की दीवार हुईं
क्या नज़रों की राहबरी है आँखों में
नींद में भी उन की पलकें वा रहती हैं
जाने किस की मुंतज़री है आँखों में
मेरी राहत मेरा हज़ मेरा आराम
सारी दौलत तू ने धरी है आँखों में
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कुछ न था बख़्त में नाकाम मोहब्बत के सिवा
ज़िंदगी काट दी मैं ने इसी सौग़ात के साथ
शब की शब एक चराग़ाँ का समाँ रहता है
शाम आ जाती है जब तेरे ख़यालात के साथ
अब्र-ए-ग़म दिल से उठे अज़-सर-ए-मिज़्गाँ बरसे
चश्म-ए-गिर्यां को अजब रब्त है बरसात के साथ
कर्ब यादों का रहा दर्द भुलाने का रहा
रंज क्या क्या न सहे गर्दिश-ए-हालात के साथ
शैख़ जी आप ने दर-बंदगी सज्दे ही गिने
दिल की ततहीर भी लाज़िम थी इबादात के साथ
मुतरिबा कौन सुने है तिरी चीख़ों की सदा
लब-ए-ल'अलीं पे थिरकते हुए नग़्मात के साथ
और तो काम सभी हो गए पूरे 'अख़लाक़'
दिल-लगी रह गई इक मर्ग-ए-मुफ़ाजात के साथ
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मुझ से मत पूछ मिरा हाल-ए-दरूँ रहने दे
सुन के टपकेगा तिरी आँखों से ख़ूँ रहने दे
सुन के टपकेगा तिरी आँखों से ख़ूँ रहने दे
फ़स्ल-ए-गुल दश्त-ए-ख़िरद में है अगरचे मौजूद
मुझ को पा-बस्ता-ए-ज़ंजीर-ए-जुनूँ रहने दे
तू करम मुझ पे करेगा तो जताएगा ज़रूर
हाल जो मेरा ज़ुबूँ है तो ज़ुबूँ रहने दे
सादगी सी कोई ज़ीनत नहीं होती जानाँ
अपनी इन शोख़ अदाओं का फ़ुसूँ रहने दे
छेड़ कर फिर वही माज़ी के पुराने क़िस्से
मुझ से मत छीन मिरे दिल का सुकूँ रहने दे
ऐ ज़माना मैं तिरे साथ बदलने से रहा
अब मैं अच्छा कि बुरा जैसा भी हूँ रहने दे
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फ़लक से चाँद चमन से गुलाब ले आए
कहाँ से कोई तुम्हारा जवाब ले आए
कहाँ से कोई तुम्हारा जवाब ले आए
हज़ार रंग हैं हुस्न-ओ-जमाल के लेकिन
वो रंग और है जिस को शबाब ले आए
अजीब तुर्फ़ा-तमाशा है ज़िंदगी मेरी
ख़ुशी भी आए तो ग़म बे-हिसाब ले आए
तिरे ख़मीर में शामिल है गुमरही वर्ना
फ़लक से कितने पयम्बर किताब ले आए
इधर वो तिश्ना-लबी है कि जाँ-ब-लब हैं हम
उधर वो दस्त-ए-करम पर सराब ले आए
उसी की आज भी रहती हैं मुंतज़िर आँखें
जो आ भी जाए तो सद इज़्तिराब ले आए
ये शेर-गोई है 'अख़लाक़' कोई खेल नहीं
करे वो मश्क़ जो छलनी में आब ले आए
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ये और बात रात भर का तय न कर सके सफ़र
मगर ये कम नहीं कि वक़्त पर चराग़ जल गए
हवा का ऐसा ज़ोर था कि इक बला का शोर था
इसी फ़ज़ा में जो थे बा-हुनर चराग़ जल गए
है बात यूँ तो रात की मगर न एहतियात की
तो क्या करोगे दफ़्अ'तन अगर चराग़ जल गए
जो साथ सुब्ह से चले वो सारे लोग दिन ढले
उसी तरफ़ को हो लिए जिधर चराग़ जल गए
वो तीरगी का जाल था कि अब सफ़र मुहाल था
हुआ ये तेरे नाम का असर चराग़ जल गए
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