देख ली उस की ये हुनर मंदी

उस ने दिल को बना लिया बंदी

ये समर ये शज़र हवा ठंडी
ख़ूब-तर शान है ख़ुदावंदी

सोचता हूँ निकाह कर डालूँ
चाहिए बस तेरी रज़ा मंदी

झूठ पर झूठ बोलते रहना
सच पे लागू यहाँ है पाबंदी

सर झुका कर ज़फर वो चलते हैं
जिन की नज़रों में है हया मंदी

— Zafar Siddqui

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Naqab Shayari

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