ये जो उस को नफ़रत की बीमारी है
माल-ओ-दौलत का वो शख़्स पुजारी है
रिश्वत आम है हर जानिब अब दुनिया में
यूँ ही तो अब झूठ का पलड़ा भारी है
उस की मीठी बातों में मत आ जाना
रहबर की सूरत में एक शिकारी है
तू तो हम से ग़ाफ़िल हो कर बैठ गया
तेरी याद में हम ने उम्र गुज़ारी है
साथ 'ज़फ़र' वो तेरा आख़िर क्या देगा
जिस के दिल में नफ़रत की चिंगारी है
— Zafar Siddqui















