खो गया था चाँद भी ये चाँदनी न रात थी

हो गए वो तल्ख़ क्यूँ हुई न कुछ भी बात थी

चल रहे थे बे-ख़बर ही साथ हम तो बख़्त के
क्या पता था ठग ने इस बिछा रखी बिसात थी

जान ने मिरी मुझे मिलाया ख़ुद की जान से
लग रही ये ज़ीस्त दिल को जख़्म की दवात थी

रो सके न इश्क़ के फ़रेब पर भी खुल के ही
और भी तो ग़म लगा के बैठे मुझ पे घात थी

चाल पे समय की भी न दाव चल ही इक सके
दी न शह है 'आभा' के चखा सके न मात थी

— Abha sethi

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Qismat Shayari

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