कितना मुश्किल है गुफ़्तगू करना
जैसे ज़ख़्मों को हो रफ़ू करना
दुश्मनी करनी है अगर मुझ से
आ के तुम मेरे रू-ब-रू करना
अब नमाज़ी तो यार वो भी हैं
जिन को आता नहीं वज़ू करना
जैसे पहले हुआ तुझे मुझ से
इश्क़ अगले से हू-ब-हू करना
है गुज़ारिश मेरी 'अतुल' तुम से
अब न फिर ऐसी आरज़ू करना
— Atul Kumar















