ज़िंदगी का ये इशारा है मुझे
अच्छे लोगों ने बिगाड़ा है मुझे
कौन था वो शख़्स जिस से इश्क़ था
उस हसीं से ही ख़सारा है मुझे
ख़्वाब देखा था इन आँखों ने कभी
रात ने अब ताना मारा है मुझे
मान अपना आसमाँ छूने चला
अब तो ग़ैरों का सहारा है मुझे
आई है आवाज़ किस की? कान तक
कौन है जिस ने पुकारा है मुझे
शख़्स वो पलकों पे रहता था मेरी
जिस ने नज़रों से उतारा है मुझे
— Atul Kumar















