हम ने ख़ुद अपनी मुहब्बत का गला घोंट दिया

दिल से उठती हुई चाहत का गला घोंट दिया

जो थी सच्चाई वो ज़ाहिर ही नहीं हो पाई
इक फ़साने ने हक़ीक़त का गला घोंट दिया

हक़ बयानी के लिए जब वो हुआ महव-ए-कलाम
इक सुख़न-वर ने सियासत का गला घोंट दिया

बस यहाँ देना था पैग़ाम-ए-मुहब्बत लेकिन
किस क़दर सब ने रिवायत का गला घोंट दिया

कामयाबी भी क़दम उस के ही चूमेगी यहाँ
जिस ने ख़ुद अपनी ज़रूरत का गला घोंट दिया

ख़ाना-ए-दिल में सदा जिस को बसाया मैं ने
उस ने ही मेरी मसर्रत का गला घोंट दिया

दिल का हर दर्द था सरमाया-ए-हस्ती लेकिन
'फ़ैज़' ने अपनी ही उल्फ़त का गला घोंट दिया

— Dard Faiz Khan

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