KARAN
KARAN
Ghazal

एहसान फ़क़त इतना मेरी जान-ए-ग़ज़ल कर

बे-कैफ़ तबीअत का मेरी मसअला हल कर

जी चाहता है तुझ को वफ़ा कह के पुकारूँ
या रख दूँ मुहब्बत मैं तेरा नाम बदल कर

दो-तरफ़ा अज़ीयत में गिरफ़्तार हुए हैं
इस इश्क़ में जलना भी है चलना भी सँभल कर

ऐ ख़ालिक़-ए-आलम मैं परेशान बहुत हूँ
तहरीर-ए-मुक़द्दर में मेरी फेर-बदल कर

रस्ता कोई मंज़िल न कोई ठौर-ठिकाना
मैं जाऊँ कहाँ आप के कूचे से निकल कर

सुनते हैं कि जादू है तेरे लम्स में मोहसिन
ज़ख़्मों को मेरे छू ले इन्हें शोख़ कँवल कर

लिल्लाह सितमगर न कर अब और सितम यूँ
सैलाब न बन जाए ग़म-ए-इश्क़ उबल कर

इस गर्मी-ए-वहशत में बदन ख़ाक न हो जाए
पानी ही न बन जाए कहीं बर्फ़ पिघल कर

फिर ख़्वाब दिखाना मेरी आँखों को मुसलसल
पहले मेरी आँखों को 'करन' ख़्वाब-महल कर

— KARAN

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