निकल पाया नहीं ये डर हमारा
कभी बिकने लगेगा घर हमारा
तुम्हें ये सब तो अब दिखता नहीं है
दिखेगा फिर किसे ये डर हमारा
ज़मीं पर ज़ोर से फेंका गया था
तुम्हारे साथ था बिस्तर हमारा
हमें अब रास्तों में मिलता है जो
वही तो था कभी दिलबर हमारा
तुम्हारे बा'द दिल टूटा मिला है
वो सह पाया न दिल ठोकर हमारा
वही इक शख़्स तो सब कुछ था मेरा
वही इक शख़्स था ज़ेवर हमारा
तेरे दर पर किया करते थे हम तो
तेरा वो दर ही था दफ़्तर हमारा
— Amanpreet singh















