बज़ाहिर कौन-सा रिश्ता नहीं है
हक़ीक़त में कोई अपना नहीं है
हमारी ख़ैरियत क्यूँ पूछते हो
तुम्हें मालूम आख़िर क्या नहीं है
ज़रूरत से तो सब मिलते हैं अपनी
हमें तुम से कोई शिकवा नहीं है
ज़माना क्या, न अपने होंगे अपने
तुम्हारे पास गर पैसा नहीं है
हमें 'क़म्बर' वही अच्छा लगे है
जिसे नज़दीक से देखा नहीं है
— Qambar Naqvi















