ये कैसे कैसे खेल रचाती हैं रोटियाँ
उँगली पे अपनी सब को नचाती हैं रोटियाँ
दो जून की तलाश में परदेस आ गए
अब याद मां के हाथो की आती हैं रोटियाँ
आसानी से मिले जिसे कीमत न जाने वों
मुश्किल से मिलती हैं उन्हें भाती हैं रोटियाँ
महबूब देखते हैं सभी चाँद में यहाँ
भूखे को चाँद में नज़र आती हैं रोटियाँ
कपड़ा मकान रोटी का ही खेल है यहाँ
कुछ जीत जाते कुछ को हराती हैं रोटियाँ
— Sonia rooh















