जिस तरफ़ भी देखिए, है आदमी ही आदमी
भीड़ में खलती है लेकिन हम को अपनों की कमी
तिलमिलाई है ग़रीबी जा़लिमों के राज में
राख कर सकती है इनको मुफ़लिसों की बरहमी
मेरी आँखें भीगती रहती हैं यादों में सदा
डर है आँखें बुझ न जाएँ इन
में है इतनी नमी
क्या हुआ हासिल किसी को जंग के मैदान से
कुछ तो चेहरे खो गए, कुछ रह गए हैं मातमी
ताज़गी आई खि़जा़ं में आप के आने के बा'द
लू भी लगती है मुझे अब तो हवाए-शबनमी
— Sonia rooh















