जब भी देखा तुझे तो मोहब्बत हुई
अब तो सूरत तेरी देखे मुद्दत हुई
जब से मुझ को किसी ग़म की आदत हुई
हाँ मेरे ग़म की तब से हिफ़ाज़त हुई
यूँ तो फिर लोग मुझ को मिले हैं बहुत
मुझ को हर मिलने वाले से वहशत हुई
रात ढलती न थी दिन वो कटते न थे
उस ज़माने को देखे भी मुद्दत हुई
चेहरा उस का मुझे तंग करता था पर
चेहरा वो चाँद सा देखे मुद्दत हुई
— Umashankar Lekhwar















