दीप से दीप हर जला रखिए
रात की तीरगी मिटा रखिए
ज़ख़्म जो यार ने दिया दिल पे
फूल जैसा उसे खिला रखिए
भाई चारा बढ़ा के आपस में
भेद के भाव को हटा रखिए
चाहे मतभेद वो रखे कितना
दोस्त फिर भी उसे बना रखिए
हो गई हो ज़बाँ भले कड़वी
नेह आँखों में तो बचा रखिए
साँप विष से भरा है वो 'गुलशन'
मत गले से उसे लगा रखिए
— Gulshan















