शिकस्त खा के भी कब हौसले हैं कम मेरे

मिरे कटे हुए हाथों में हैं अलम मेरे

पनाह-गाह मुझे भी तो सौर जैसी दे
मिरी तलाश में दुश्मन हैं ताज़ा-दम मेरे

तुझे मैं कैसे बताऊँ कहाँ से कैसा हूँ
उलझ रहे हैं ब-दस्तूर पेच-ओ-ख़म मेरे

किस आसमान की वुसअत तलाश करते हुए
ज़मीं से दूर निकल आए हैं क़दम मेरे

तू ये सवाल भी अब दजला ओ फ़ुरात से पूछ
मैं क्या बताऊँ कहाँ लुट गए हरम मेरे

जमी रही है चटानों पे बर्फ़ सदियों तक
तो जा के फिर कहीं पत्थर हुए हैं नम मेरे

— Afzal Gauhar Rao

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