अपने माहौल से कुछ यूँँ भी तो घबराए न थे

संग लिपटे हुए फूलों में नज़र आए न थे

दर्द ज़ंजीर की सूरत है दिलों में मौजूद
इस से पहले तो कभी उस के ये पैराए न थे

चंद बिखरे हुए रेज़ों के सिवा कुछ भी नहीं
सोचते हैं कि चटानों से भी टकराए न थे

तू ने ख़ुद रोज़-ए-अज़ल हम से पनाहें माँगीं
ज़िंदगी हम तुझे दामन में छपा लाए न थे

हम कि हर दौर की तज़ईं में रहे हैं शामिल
अब भी पछताए नहीं पहले भी पछताए न थे

— Afzal Minhas

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