बिछड़ गया था तो उस का ख़याल क्यूँ आया
यही तो दुख है कि शीशे में बाल क्यूँ आया
नई किरन से अभी आश्ना हुई थी ज़मीं
जवाँ था महर ये इस पर ज़वाल क्यूँ आया
जब एक बर्ग न अश्जार-ए-आरज़ू पे रहा
तो मस्त मौसम-ए-बाद-ए-शुमाल क्यूँ आया
हर आरज़ू हुई क्यूँ उस की बज़्म में घाइल
हर एक ख़्वाब वहाँ से निढाल क्यूँ आया
अगर नहीं है तुझे रंज बे-वफ़ाई का
तो तेरे लहजे में इतना मलाल क्यूँ आया
— Ahmad Azeem















