बिछड़ने देती नहीं ढूँढ़ ही निकालती है
अजीब है न मुझे बे-ख़ुदी सँभालती है
मैं कब का हार चुका ज़िंदगी तिरी बाज़ी
हवा में किस लिए सिक्का नया उछालती है
हुआ है शक मिरी तन्हाई को मुझे ले कर
उलट पलट के हर एक चीज़ को खंगालती है
झुलस न दें कहीं सच्चाइयाँ उसे इक दिन
वो ख़्वाब आँख जिसे छाँव छाँव पालती है
दुबक गई है किरन जो अभी धुंधलके में
वही तो सुब्ह को सूरज नया उजालती है
— Akhilesh Tiwari















