रौशनी के न थे आसार बंद कमरे में

वो तो लौ दे उठा किरदार बंद कमरे में

है गुज़र अपना ही मुश्किल तो फिर तअ'ज्जुब है
किस तरह आ गया बाज़ार बंद कमरे में

शे'र जितने कहे ख़ारिज किए सिवा उस से
सिर्फ़ पुर्ज़ों का है अम्बार बंद कमरे में

चाँद तारों से अलग एक और दुनिया है
बाँचता था कोई अख़बार बंद कमरे में

तज्रबा ख़ूब है इस पर अमल भी करना है
रहना है ख़ुद से ही हुश्यार बंद कमरे में

जोड़ कर रखता था दुनिया से जो वो ही एहसास
अब पड़ा रहता है बीमार बंद कमरे में

सच अगर झूट को तस्लीम कर भी लूँ तो अना
रूठ कर करती है तकरार बंद कमरे में

— Akhilesh Tiwari

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