Akhilesh Tiwari

Akhilesh Tiwari

@akhilesh-tiwari

Akhilesh Tiwari shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Akhilesh Tiwari's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
कहने को कमरे में सारे यकजा बैठे हैं
अपने अपने मोबाइल पर तन्हा बैठे हैं

अपने ही ख़्वाबों को करके पिंजरा बैठे हैं
करने क्या आए थे लेकिन कर क्या बैठे हैं

जाने किस के हाथ लगा चेहरा जो अपना था
बे-मतलब कब से ले कर आईना बैठे हैं

एक सबक़ रटते तो हैं पर याद नहीं होता
तिफ़्ल-ए-मकतब कब से खोले बस्ता बैठे हैं

फिर वीरान शजर पर वो ही रौनक़ लौटी है
फिर वो पंछी वापस डालों पर आ बैठे हैं

नाहक़ आप निकल आए दिल की पगडंडी पर
ख़ारों में अब अपना दामन उलझा बैठे हैं

तन्हाई वाहिद रस्ता था तुम तक आने का
दुनिया वाले इस पर भी दुनिया ला बैठे हैं

एक समुंदर भेद छुपाए जज़्ब करे सब को
आस लगाए कब से कितने दरिया बैठे हैं

रोज़ वही आहट वो ही सरगोशी भीतर से
अपने में हम अपने से ही उक्ता बैठे हैं

शाम से पहले लौट के घर आने की उजलत में
सीधा सा रस्ता रस्तों में उलझा बैठे हैं
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Akhilesh Tiwari
जोड़ कर रक्खी हुई सब पाई पाई ले उड़ी
दुनिया एहसासात की गाढ़ी कमाई ले उड़ी

मुतमइन थे राज़-ए-दिल हम में कहीं महफ़ूज़ है
उस को भी तन्हाई की पर आवा-जाई ले अड़ी

एक सदा आई क़फ़स के पार भी कोई जाल है
आशियाँ की ओर जब हम को रिहाई ले उड़ी

सच की उर्यानी पहनती क्यों क़बा तहरीर की
छीन ली मुझ से क़लम फिर रौशनाई ले उड़ी

अब्र का टुकड़ा मेरे हमराह कितनी दूर तक
चील सी कोई हवा की मौज आई ले उड़ी

लड़खड़ाते पाँव थे पर थे तो मंज़िल की तरफ़
रास्ता ही रहबरों की रहनुमाई ले उड़ी

हम से आवारा-मिज़ाजों की कोई मंज़िल कहाँ
आप को भी आप की ही पारसाई ले उड़ी

ढूँडते हो अब कहाँ 'अखिलेश' वो साए घने
बरगदों की शख़्सियत तो बोन्साई ले उड़ी
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Akhilesh Tiwari
रौशनी तेज़ हुई कोई सितारा टूटा
धार में अब के नदी का ही किनारा टूटा

थरथराते हुए लब चुप तो लगा बैठे पर
चुप ने ही जोड़ा भी इज़हार हमारा टूटा

दर-ब-दर फिरता कोई ख़्वाब मिरा आवारा
रात आँखों में चला आया था हारा टूटा

जाने किस मोड़ पे बिछड़ी वो सदा माज़ी की
एक तिनके का सहारा था सहारा टूटा

धूप चढ़ते ही पिलाता था जो सहरा पानी
धूप ढलते ही तिलिस्मी वो नज़ारा टूटा

फ़िक्र ओ मआ'नी के चुने शे'र उसी मलबे से
हम ने तन्हाई का देखा जो इदारा टूटा
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Akhilesh Tiwari
जिन से डरते थे मरासिम उन हदों तक आ गए
आप से फिर रफ़्ता रफ़्ता ख़ुद से हम उक्ता गए

रेत पर कुछ दूर तक देखे थे हम ने साफ़ साफ़
फिर ग़ुबार उठा कोई वो नक़्श भी धुँधला गए

ख़ुद-कुशी सूरज ने कर ली ये बताने के लिए
काले रंगों के परिंदे आसमाँ पर छा गए

चंद जुगनू हैं यहाँ पर और मुसलसल तीरगी
साहबो हम शम्अ' ले कर किस खंडर में आ गए

वो वली है और न बादा-ख़्वार है दानिशवरों
आप भी हम-ज़ाद से मेरा ही धोखा खा गए
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Akhilesh Tiwari
बिछड़ने देती नहीं ढूँढ ही निकालती है
अजीब है न मुझे बे-ख़ुदी सँभालती है

मैं कब का हार चुका ज़िंदगी तिरी बाज़ी
हवा में किस लिए सिक्का नया उछालती है

हुआ है शक मिरी तन्हाई को मुझे ले कर
उलट पलट के हर एक चीज़ को खंगालती है

झुलस न दें कहीं सच्चाइयाँ उसे इक दिन
वो ख़्वाब आँख जिसे छाँव छाँव पालती है

दुबक गई है किरन जो अभी धुंधलके में
वही तो सुब्ह को सूरज नया उजालती है
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Akhilesh Tiwari
फ़रेब खाना नहीं बार बार चीख़ता है
नदी की तह से कोई रेगज़ार चीख़ता है

बदन के ग़ार से बे-इख़्तियार चीख़ता है
शिकार होने से पहले शिकार चीख़ता है

तमाम दिन तो नहीं टूटता तिलिस्म-एसदा
तमाम रात भी बस इंतिज़ार चीख़ता है

उधर न जाना उधर रास्ते में मंज़िल है
सफ़र का लुत्फ़ सर-ए-रहगुज़ार चीख़ता है

महाज़-ए-जंग में पहले हरीफ़ तय तो हों
लगाम थामे हुए शहसवार चीख़ता है

तमाम उम्र का हासिल है सिर्फ़ तन्हाई
बुलंदियों से कोई कोहसार चीख़ता है

इसी लिए तो मैं ख़ुद से ही भागा फिरता हूँ
कोई है मुझ में नसीहत-गुज़ार चीख़ता है
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Akhilesh Tiwari
रौशनी के न थे आसार बंद कमरे में
वो तो लौ दे उठा किरदार बंद कमरे में

है गुज़र अपना ही मुश्किल तो फिर तअ'ज्जुब है
किस तरह आ गया बाज़ार बंद कमरे में

शेर जितने कहे ख़ारिज किए सिवा उस से
सिर्फ़ पुर्ज़ों का है अम्बार बंद कमरे में

चाँद तारों से अलग एक और दुनिया है
बाँचता था कोई अख़बार बंद कमरे में

तज्रबा ख़ूब है इस पर अमल भी करना है
रहना है ख़ुद से ही हुश्यार बंद कमरे में

जोड़ कर रखता था दुनिया से जो वो ही एहसास
अब पड़ा रहता है बीमार बंद कमरे में

सच अगर झूट को तस्लीम कर भी लूँ तो अना
रूठ कर करती है तकरार बंद कमरे में
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Akhilesh Tiwari
एक वही मा'मूल निभाना होगा फिर
ख़ुद को खो कर ख़ुद को पाना होगा फिर

राहगुज़र तन्हाई की है ध्यान रहे
रस्ते में ही एक ज़माना होगा फिर

राह भटक जाओ अब के ये मुमकिन है
पर इस जंगल में से जाना होगा फिर

जिन की आसानी ही जिन की मुश्किल है
उन लफ़्ज़ों को ही दोहराना होगा फिर

वो फलदार दरख़्त गिराया आँधी ने
उन का अब किस ओर निशाना होगा फिर

आज तो उस से मेरी रातें रौशन हैं
कल को जब ये ज़ख़्म पुराना होगा फिर

कब सोचा था चुप्पी बोलेगी ऐसे
आवाज़ों से यूँ वीराना होगा फिर

सहरा में जो ख़ाक उड़ी है बे-मौसम
देखो तो वो ही दीवाना होगा फिर
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Akhilesh Tiwari
है तो पगडंडी नज़र में मो'तबर अल्फ़ाज़ की
ले के जाएगी कहाँ तक रहगुज़र अल्फ़ाज़ की

इस से आगे सिर्फ़ तो है और मआ'नी का तिलिस्म
अब कोई हिकमत न होगी कारगर अल्फ़ाज़ की

किस गली में छोड़ कर रुख़्सत हुई परछाइयाँ
मैं हूँ और बेबस सदाएँ दर-ब-दर अल्फ़ाज़ की

ख़ामुशी के इन हरे पेड़ों पे जाने क्या बनी
आरियाँ चलती सुनी हैं रात भर अल्फ़ाज़ की

और इक जज़्बे ने काग़ज़ पर अभी तोड़ा है दम
रह गईं सब कोशिशें फिर बे-असर अल्फ़ाज़ की

तुम ने जो पिछली रुतों में बो दिए थे हर्फ़ कुछ
फ़स्ल उग आई है देखो बा-समर अल्फ़ाज़ की

होश वालों ने उसे आख़िर मोहज़्ज़ब कर दिया
वो जो बे-ख़बरी थी लाती थी ख़बर अल्फ़ाज़ की

जिस्म से बाहर निकल आई नुमाइश के लिए
ख़ुद-नुमाई की हवस थी किस क़दर अल्फ़ाज़ की
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Akhilesh Tiwari
कब तक घुट कर जीते रहते सच्चाई के मारे ख़्वाब
पलकों की दहलीज़ से बाहर निकले फिर बंजारे ख़्वाब

फ़ितरत से ही आवारा हैं कब ठहरे जो ठहरेंगे
कैसे पलकों पर अटके हैं कुछ ख़ुश-रंग तुम्हारे ख़्वाब

अब मौला ही जाने इन में अपना कौन पराया कौन
हँस हँस कर हर शब मिलते हैं यूँ तो इतने सारे ख़्वाब

जीवन की इस आपा-धापी में जो पीछे छूट गए
जाने अब किस हाल में होंगे वो क़िस्मत के मारे ख़्वाब

ताबीरों की फ़स्लें कैसी उगती हैं कल देखेंगे
हम ने भी बोए हैं शब भर रंग-बिरंगे प्यारे ख़्वाब

कब 'अखिलेश' तवक़्क़ो की थी बर्फ़ीली इस घाटी से
आँखों से बरसेंगे उस की बन कर यूँ अंगारे ख़्वाब
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Akhilesh Tiwari
घर को भी घर कर न पाए और न वीरानी मिली
बस यही मुश्किल थी अपनी सिर्फ़ आसानी मिली

मुंतज़िर कितने ख़ुदा थे हर तरफ़ अब क्या कहें
जब के सज्दों के लिए बस एक पेशानी मिली

इस गली से आज मुद्दत बाद जाना फिर हुआ
आज भी हैरत से तकती हम को हैरानी मिली

अजनबी इस भीड़ में तन्हाई भी आई नज़र
दिल को कुछ तस्कीं हुई इक शक्ल पहचानी मिली

आँसुओं से रात जो नम हो गया था बे-तरह
आप के इस ख़्वाब को क्या फिर से ताबानी मिली
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Akhilesh Tiwari
किसे जाना कहाँ है मुनहसिर होता है इस पर भी
भटकता है कोई बाहर तो कोई घर के भीतर भी

किसी को आस बादल से कोई दरियाओं का तालिब
अगर है तिश्ना-लब सहरा तो प्यासा है समुंदर भी

शिकस्ता ख़्वाब की किर्चें पड़ी हैं आँख में शायद
नज़र में चुभता है जब तब अधूरा सा वो मंज़र भी

सुराग़ इस से ही लग जाए मिरे होने न होने का
गुज़र कर देख ही लेता हूँ अपने में से हो कर भी

जिसे परछाईं समझे थे हक़ीक़त में न पैकर हो
परखना चाहिए था आप को उस शय को छू कर भी

पलट कर मुद्दतों बअ'द अपनी तहरीरों से गुज़रूँ तो
लगे अक्सर कि हो सकता था इस से और बेहतर भी
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Akhilesh Tiwari
जिस्म के ग़ार के दहाने पर
वो ही किरदार था निशाने पर

क्या मुक़ाबिल थी अब के भी दीवार
कोई बोला नहीं बुलाने पर

इक मआ'नी ने और दम तोड़ा
ऐन अल्फ़ाज़ के मुहाने पर

साएबाँ के तले कहाँ रहती
धूप जा बैठी शामियाने पर

वो भी ईमान तक चला आया
आ गए हम भी मुस्कुराने पर

शोर तन्हाइयाँ भी करती हैं
ये खुला कोई याद आने पर

रत-जगा धुंध ख़्वाब सरगोशी
इतने मेहमाँ ग़रीब-ख़ाने पर

ज़ख़्म का वो ही रोज़ का रोना
ज़ब्त की ज़िद भी आज़माने पर

लाओ नाकामियों का जाम इधर
ख़ाक डालो भी अब ज़माना पर

ख़ुद को ख़ुद में समेट कर उठिए
आ गई धूप भी सिरहाने पर

मुतमइन अक़्ल क्यों नहीं आख़िर
लग गया दिल भी जब ठिकाने पर
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Akhilesh Tiwari
उड़ा के फिर वही गर्द-ओ-ग़ुबार पहले सा
बुला रहा है सफ़र बार-बार पहले सा

वो एक धुँद थी आख़िर को छट ही जाना थी
दिखाई देने लगा आर-पार पहले सा

नदी ने राह समुंदर की फिर वही पकड़ी
सदाएँ देता रहा रेगज़ार पहले सा

कहीं ढलान मुक़द्दर न हो बुलंदी का
चढ़ाई फिर न हो अपना उतार पहले सा

सवाल क्यूँ न चराग़-ए-सहर से कर देखें
जुनून अब भी है क्या बरक़रार पहले सा

तो क्या पलट के वही दिन फिर आने वाले हैं
कई दिनों से है दिल बे-क़रार पहले सा
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Akhilesh Tiwari
वक़्त कर दे न पाएमाल मुझे
अब किसी शक्ल में तो ढाल मुझे

अक़्ल वालों में है गुज़र मेरा
मेरी दीवानगी सँभाल मुझे

मैं ज़मीं भूलता नहीं हरगिज़
तू बड़े शौक़ से उछाल मुझे

तजरबे थे जुदा जुदा अपने
तुम को दाना दिखा था जाल मुझे

और कब तक रहूँ मुअत्तल सा
कर दे माज़ी मिरे बहाल मुझे
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Akhilesh Tiwari
न धूप धूप रहे और न साया साया तो
जुनून-ए-शौक़ अगर फिर वहीं पे लाया तो

क़दम बढ़ा तो लूँ आबादियों की सम्त मगर
मुझे वो ढूँढता तन्हाइयों में आया तो

सुलूक ख़ुद से हरीफ़ाना कौन चाहेगा
अगरचे तू ने मुझे ज़िंदगी निभाया तो

मैं जिस की ओट में मौसम की मार सहता हूँ
कहीं खंडर भी वो बारिश ने अब के ढाया तो

मगर गई न महक मुझ से मेरे माज़ी की
नदी की धार में सौ बार मैं नहाया तो

शरीफ़ लोग थे आदी थे बंद कमरों के
लरज़ उठे किसी ने क़हक़हा लगाया तो

है रस्म-ओ-राह की सूरत अभी ग़नीमत है
नदी ने देख मुझे हाथ फिर हिलाया तो
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Akhilesh Tiwari
कभी तो डूब चले हम कभी उभरते हुए
ख़ुद अपनी ज़ात के दरिया को पार करते हुए

यहीं से राह कोई आसमाँ को जाती थी
ख़याल आया हमें सीढ़ियाँ उतरते हुए

अगर वो ख़्वाब है जो आँख में सलामत है
तो फिर ये क्या है जिसे देखता हूँ मरते हुए

सिमट के ख़ुद में मिरा ख़ैर क्या बना होता
हवा के दोश पे था दूर तक बिखरते हुए

नए सफ़र की कहीं इब्तिदा न हो मंज़िल
ये पाँव पूछ रहे हैं थकन से डरते हुए

अभी तो दूर तलक आसमान सूना था
कहाँ से आ गए पंछी उड़ान भरते हुए
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नदी का क्या है जिधर चाहे उस डगर जाए
मगर ये प्यास मुझे छोड़ दे तो मर जाए

कभी तो दिल यही उकसाए ख़ामुशी के ख़िलाफ़
लबों का खुलना ही इस को कभी अखर जाए

कभी तो चल पड़े मंज़िल ही रास्ते की तरह
कभी ये राह भी चल चल के फिर ठहर जाए

कोई तो बात है पिछले पहर में रातों के
ये बंद कमरा अजब रौशनी से भर जाए

ये तेरा ध्यान कि सहमा परिंदा हो कोई
ज़रा सी साँस की आहट भी हो तो डर जाए

बहुत सँभाल के दर्पन अना है ये 'अखिलेश'
ज़रा सी चूक से ऐसा न हो बिखर जाए
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वहम ही होगा मगर रोज़ कहाँ होता है
धुंध छाई है तो इक चेहरा अयाँ होता है

शाम ख़ुश-रंग परिंदों के चहक जाने से
घर हुआ जाता है दिन में जो मकाँ होता है

वो कोई जज़्बा हो अल्फ़ाज़ का मोहताज नहीं
कुछ न कहना भी ख़ुद अपनी ही ज़बाँ होता है

बे-सबब कुछ भी नहीं होता है या यूँ कहिए
आग लगती है कहीं पर तो धुआँ होता है

बाज़-गश्त और सदाओं की उभर आती है
जितना ख़ाली कोई 'अखिलेश' कुआँ होता है
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मुलाहिज़ा हो मिरी भी उड़ान पिंजरे में
अता हुए हैं मुझे दो-जहान पिंजरे में

है सैर-गाह भी और इस में आब-ओ-दाना भी
रखा गया है मिरा कितना ध्यान पिंजरे में

इस एक शर्त पर उस ने रिहा किया मुझ को
रखेगा रेहन वो मेरी उड़ान पिंजरे में

यहीं हलाक हुआ है परिंदा ख़्वाहिश का
तभी तो हैं ये लहू के निशान पिंजरे में

मुझे सताएगा तन्हाइयों का मौसम क्या
है मेरे साथ मिरा ख़ानदान पिंजरे में

फ़लक पे जब भी परिंदों की सफ़ नज़र आई
हुई हैं कितनी ही यादें जवान पिंजरे में

ख़याल आया हमें भी ख़ुदा की रहमत का
सुनाई जब भी पड़ी है अज़ान पिंजरे में

तरह तरह के सबक़ इस लिए रटाए गए
मैं भूल जाऊँ खुला आसमान पिंजरे में
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