रेत पर कुछ दूर तक देखे थे हम ने साफ़ साफ़
फिर ग़ुबार उठा कोई वो नक़्श भी धुँधला गए
ख़ुद-कुशी सूरज ने कर ली ये बताने के लिए
काले रंगों के परिंदे आसमाँ पर छा गए
चंद जुगनू हैं यहाँ पर और मुसलसल तीरगी
साहबो हम शम्अ'' ले कर किस खंडर में आ गए
वो वली है और न बादा-ख़्वार है दानिशवरों
आप भी हम-ज़ाद से मेरा ही धोखा खा गए
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बिछड़ने देती नहीं ढूँढ़ ही निकालती है
अजीब है न मुझे बे-ख़ुदी सँभालती है
अजीब है न मुझे बे-ख़ुदी सँभालती है
मैं कब का हार चुका ज़िंदगी तिरी बाज़ी
हवा में किस लिए सिक्का नया उछालती है
हुआ है शक मिरी तन्हाई को मुझे ले कर
उलट पलट के हर एक चीज़ को खंगालती है
झुलस न दें कहीं सच्चाइयाँ उसे इक दिन
वो ख़्वाब आँख जिसे छाँव छाँव पालती है
दुबक गई है किरन जो अभी धुंधलके में
वही तो सुब्ह को सूरज नया उजालती है
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बदन के ग़ार से बे-इख़्तियार चीख़ता है
शिकार होने से पहले शिकार चीख़ता है
तमाम दिन तो नहीं टूटता तिलिस्म-एसदा
तमाम रात भी बस इंतिज़ार चीख़ता है
उधर न जाना उधर रास्ते में मंज़िल है
सफ़र का लुत्फ़ सर-ए-रहगुज़ार चीख़ता है
महाज़-ए-जंग में पहले हरीफ़ तय तो हों
लगाम था
में हुए शहसवार चीख़ता है
तमाम उम्र का हासिल है सिर्फ़ तन्हाई
बुलंदियों से कोई कोहसार चीख़ता है
इसी लिए तो मैं ख़ुद से ही भागा फिरता हूँ
कोई है मुझ में नसीहत-गुज़ार चीख़ता है
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रौशनी के न थे आसार बंद कमरे में
वो तो लौ दे उठा किरदार बंद कमरे में
वो तो लौ दे उठा किरदार बंद कमरे में
है गुज़र अपना ही मुश्किल तो फिर तअ'ज्जुब है
किस तरह आ गया बाज़ार बंद कमरे में
शे'र जितने कहे ख़ारिज किए सिवा उस से
सिर्फ़ पुर्ज़ों का है अम्बार बंद कमरे में
चाँद तारों से अलग एक और दुनिया है
बाँचता था कोई अख़बार बंद कमरे में
तज्रबा ख़ूब है इस पर अमल भी करना है
रहना है ख़ुद से ही हुश्यार बंद कमरे में
जोड़ कर रखता था दुनिया से जो वो ही एहसास
अब पड़ा रहता है बीमार बंद कमरे में
सच अगर झूट को तस्लीम कर भी लूँ तो अना
रूठ कर करती है तकरार बंद कमरे में
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एक वही मा'मूल निभाना होगा फिर
ख़ुद को खो कर ख़ुद को पाना होगा फिर
ख़ुद को खो कर ख़ुद को पाना होगा फिर
राह-गुज़र तन्हाई की है ध्यान रहे
रस्ते में ही एक ज़माना होगा फिर
राह भटक जाओ अब के ये मुमकिन है
पर इस जंगल में से जाना होगा फिर
जिन की आसानी ही जिन की मुश्किल है
उन लफ़्ज़ों को ही दोहराना होगा फिर
वो फलदार दरख़्त गिराया आँधी ने
उन का अब किस ओर निशाना होगा फिर
आज तो उस से मेरी रातें रौशन हैं
कल को जब ये ज़ख़्म पुराना होगा फिर
कब सोचा था चुप्पी बोलेगी ऐसे
आवाज़ों से यूँ वीराना होगा फिर
सहरा में जो ख़ाक उड़ी है बे-मौसम
देखो तो वो ही दीवाना होगा फिर
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कब तक घुट कर जीते रहते सच्चाई के मारे ख़्वाब
पलकों की दहलीज़ से बाहर निकले फिर बंजारे ख़्वाब
पलकों की दहलीज़ से बाहर निकले फिर बंजारे ख़्वाब
फ़ितरत से ही आवारा हैं कब ठहरे जो ठहरेंगे
कैसे पलकों पर अटके हैं कुछ ख़ुश-रंग तुम्हारे ख़्वाब
अब मौला ही जाने इन में अपना कौन पराया कौन
हँस हँस कर हर शब मिलते हैं यूँ तो इतने सारे ख़्वाब
जीवन की इस आपा-धापी में जो पीछे छूट गए
जाने अब किस हाल में होंगे वो क़िस्मत के मारे ख़्वाब
ताबीरों की फ़स्लें कैसी उगती हैं कल देखेंगे
हम ने भी बोए हैं शब भर रंग-बिरंगे प्यारे ख़्वाब
कब 'अखिलेश' तवक़्क़ो की थी बर्फ़ीली इस घाटी से
आँखों से बरसेंगे उस की बन कर यूँ अंगारे ख़्वाब
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घर को भी घर कर न पाए और न वीरानी मिली
बस यही मुश्किल थी अपनी सिर्फ़ आसानी मिली
बस यही मुश्किल थी अपनी सिर्फ़ आसानी मिली
मुंतज़िर कितने ख़ुदा थे हर तरफ़ अब क्या कहें
जब के सज्दों के लिए बस एक पेशानी मिली
इस गली से आज मुद्दत बा'द जाना फिर हुआ
आज भी हैरत से तकती हम को हैरानी मिली
अजनबी इस भीड़ में तन्हाई भी आई नज़र
दिल को कुछ तस्कीं हुई इक शक्ल पहचानी मिली
आँसुओं से रात जो नम हो गया था बे-तरह
आप के इस ख़्वाब को क्या फिर से ताबानी मिली
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मुलाहिज़ा हो मिरी भी उड़ान पिंजरे में
अता हुए हैं मुझे दो-जहान पिंजरे में
अता हुए हैं मुझे दो-जहान पिंजरे में
है सैर-गाह भी और इस में आब-ओ-दाना भी
रखा गया है मिरा कितना ध्यान पिंजरे में
इस एक शर्त पर उस ने रिहा किया मुझ को
रखेगा रेहन वो मेरी उड़ान पिंजरे में
यहीं हलाक हुआ है परिंदा ख़्वाहिश का
तभी तो हैं ये लहू के निशान पिंजरे में
मुझे सताएगा तन्हाइयों का मौसम क्या
है मेरे साथ मिरा ख़ानदान पिंजरे में
फ़लक पे जब भी परिंदों की सफ़ नज़र आई
हुई हैं कितनी ही यादें जवान पिंजरे में
ख़याल आया हमें भी ख़ुदा की रहमत का
सुनाई जब भी पड़ी है अज़ान पिंजरे में
तरह तरह के सबक़ इस लिए रटाए गए
मैं भूल जाऊँ खुला आसमान पिंजरे में
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हँसना रोना पाना खोना मरना जीना पानी पर
पढ़िए तो क्या क्या लिक्खा है दरिया की पेशानी पर
पढ़िए तो क्या क्या लिक्खा है दरिया की पेशानी पर
महँगाई है दाम मिलेंगे सोचा था हम ने लेकिन
शर्मिंदा हो कर लौटे हैं ख़्वाबों की अर्ज़ानी पर
अब तक उजड़े-पन में शायद कुछ नज़्ज़ारों लाएक़ है
वर्ना जमघट क्यूँ उमडा रहता है इस वीरानी पर
रात जो आँखों में चमके जुगनू मैं उन का शाहिद हूँ
आप भले चर्चा करिए अब सूरज की ताबानी पर
सुब्ह-सवेरा दफ़्तर बीवी बच्चे महफ़िल नींदें रात
यार किसी को मुश्किल भी होती है इस आसानी पर
उस की सपनों वाली परियाँ क्यूँ मैं देख नहीं पाता
बच्चा हैराँ है मुझ पर मैं बच्चे की हैरानी पर
एक अछूता मंज़र मुझ को छू कर गुज़रा था अब तो
पछताना है ख़ुद में डूबे रहने की नादानी पर
हम फ़नकारों की फ़ितरत से वाक़िफ़ हो तुम तो 'अखिलेश'
मक़्सद समझो रुक मत जाना बस लफ़्ज़ों के मअ'नी पर
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