हमारी क्या यही बस ज़िंदगी है
जिधर देखो उधर बस बेबसी है
किसे हम दास्ताँ अपनी सुनाते
यहाँ हर एक को अपनी पड़ी है
किसी दिन पूछती तुम हाल मेरा
मुझे जानाँ बहुत तेरी कमी है
सही थे आप जो समझाया मुझ को
मिरे उस हाल पर शर्मिंदगी है
— Aktar ali
जिधर देखो उधर बस बेबसी है
किसे हम दास्ताँ अपनी सुनाते
यहाँ हर एक को अपनी पड़ी है
किसी दिन पूछती तुम हाल मेरा
मुझे जानाँ बहुत तेरी कमी है
सही थे आप जो समझाया मुझ को
मिरे उस हाल पर शर्मिंदगी है
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