वैसे तो अच्छी भली है ज़िंदगी

फिर भी लगता है बुरी है ज़िंदगी

देख कर ऐसा तमाशा मौत का
हम सभी में क्या बची है ज़िंदगी

वो ही जीता है जीयेगा शान से
जिस की क़िस्मत में लिखी है ज़िंदगी

पहले बचपन फिर जवानी फिर ज़ईफ
मैं ने भी ऐसी सुनी है ज़िंदगी

तुम जो आए हो सनम मेरे क़रीब
हर घड़ी जैसे नई है ज़िंदगी

मुस्कुरा कर रूह ने जब जिस्म का
हाथ थामा तो चली है ज़िंदगी

मैं 'अनन्या' सोचती रहती हूँ क्यूँ
क्या हक़ीक़त में मेरी है ज़िंदगी

— Ananya Rai Parashar

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