उल्फ़त की एक एक निशानी का क्या करें
किरदार जब नहीं हैं कहानी का क्या करें
अच्छी तरह से याद है तरसे हैं बूँद बूँद
बेवक़्त अब जो बरसा है, पानी का क्या करें
इस मुफ़्लिसी के दौर में उठता है ये सवाल
बचपन तो जा चुका है जवानी का क्या करें
जब से पसंद आई है उन को नई ग़ज़ल
तब से सवाल है कि पुरानी का क्या करें
कोई भी शख़्स सुनने को तैयार ही नहीं
नानक, कबीर, बुद्ध की बानी का क्या करें
ये रह के दिल को याद दिलाती है आप की
इस चाँदनी में रात की रानी का क्या करें
हिलती नहीं जो सूखे हुए पेड़ की तरह
ठहरी हुई बदन की रवानी का क्या करें
— Arvind Asar















