0

मैं कभी मकाँ से गुज़र गया कभी ला-मकाँ से गुज़र गया  - Dr. Naresh

मैं कभी मकाँ से गुज़र गया कभी ला-मकाँ से गुज़र गया
तिरे शौक़ में तुझे क्या ख़बर मैं कहाँ कहाँ से गुज़र गया

हैं क़दम क़दम पे वहाँ वहाँ मिरी जुस्तुजू की कहानियाँ
तिरे संग-ए-दर की तलाश में मैं जहाँ जहाँ से गुज़र गया

मैं गुनाहगार-ए-वफ़ा हूँ वो जो तलाश-ए-यार के जोश में
जहाँ पेश आईं मुसीबतें ब-खु़शी वहाँ से गुज़र गया

कोई बे-ख़ुदी सी है बे-ख़ुदी मुझे ये भी होश नहीं रहा
तिरा दर्द दिल में लिए मैं कब तिरे आस्ताँ से गुज़र गया

मिरी राह-ए-फ़र्ज़ पे हम-नशीं कहीं हुस्न था कहीं इश्क़ था
मैं ब-फ़ज़्ल-ए-मालिक-ए-दो-जहाँ यूँही दरमियाँ से गुज़र गया

किसे ढूँढती है नज़र तिरी यहाँ कोई अहल-ए-गुनह नहीं
वही इक 'नरेश' था ऐ ख़ुदा जो तिरे जहाँ से गुज़र गया

Dr. Naresh
0

Share this on social media

Miscellaneous Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Dr. Naresh

As you were reading Shayari by Dr. Naresh

Similar Writers

our suggestion based on Dr. Naresh

Similar Moods

As you were reading Miscellaneous Shayari