0

माज़ी को अपने भूल न जाएँ तो क्या करें  - Dr. Rahi

माज़ी को अपने भूल न जाएँ तो क्या करें
कब तक हम आसमान के तारे गिना करें

यादों के क़ाफ़िले को लिए साथ क्या करें
मंज़िल ही जब नहीं है तो फिर क्यों चला करें

तुम हो हमारे साथ तो दुनिया है साथ साथ
जब तुम नहीं हो साथ तो दुनिया को क्या करें

रह रह के दे रहा है दिल आवाज़-ए-बाज़-गश्त
आदम की तरह हम भी न क्यों इक ख़ता करें

तन्हाई दूर हो के रहेगी इसी तरह
चुप-चाप जब भी वक़्त मिले हम मिला करें

ऐलान-ए-हक़ करूँगा ज़रूर उन के सामने
अब चाहे मेरे सर को वो तन से जुदा करें

मुमकिन है इस दुआ से ही बाब-ए-असर खुले
आओ उठा के हाथ को अपने दुआ करें

तितली की तरह फूल से लिपटा रहूँगा मैं
चलने दो लाख तेज़ हवाएँ चला करें

क्या लुत्फ़-ए-मय वो सामने 'राही' अगर नहीं
उठती हैं आसमाँ पे घटाएँ उठा करें

Dr. Rahi
0

Share this on social media

Miscellaneous Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Dr. Rahi

As you were reading Shayari by Dr. Rahi

Similar Writers

our suggestion based on Dr. Rahi

Similar Moods

As you were reading Miscellaneous Shayari