बुरा मुझ को बुरा अच्छा फ़क़त अच्छा समझता है

मुझे है जानकारी कौन मुझ को क्या समझता है

हमारी इस लिए तो दोस्ती होती है फिर पक्की
यही इक सच है लड़के को यहाँ लड़का समझता है

सुनो मजबूर हो कर फिर किसी ने सर झुकाया है
मगर हाकिम इसे भी तो यहाँ सजदा समझता है

उसी का इश्क़ होता है मुकम्मल इस ज़माने में
फ़क़त जो इश्क़ को अपना यहाँ बच्चा समझता है

— Kamlesh Goyal

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