इक उसी हसीं लड़की को मैं ख़्वाब लिखता हूँ
उस के प्यार में हासिल वो ख़िताब लिखता हूँ
अब मिरी अमावस की रात भी नहीं होती
जब तिरी ये सूरत को माहताब लिखता हूँ
हाँ मिरा तिरी इक मुस्कान दिन बनाती है
जब मैं इन लबों को ताज़ा गुलाब लिखता हूँ
ये नशा चढ़ा मुझ पर अब नहीं उतरता है
मैं तिरी इन्हीं नज़रों को शराब लिखता हूँ
— Kamlesh Goyal















