उठा कर ज़िन्दगी की तुम सभी रंगीनियाँ रख दो
निकालो कोह से दरिया जहाँ भी बिजलियाँ रख दो
मेरे पत्थर बदन पर आ के कुछ सरगर्मियाँ रख दो
गुज़ारिश है लबों की आज तुम मदहोशियाँ रख दो
हज़ारों रंज शामिल हैं हमारे दरमियाँ माना
उठो काटो अलग कर के अना की बेड़ियाँ रख दो
इमारत ही इमारत के घने जंगल बसाए हैं
कि कह दो शम्स से जा कर तपिश में नर्मियाँ रख दो
बहुत से दिन गुज़ारे हैं ख़मोशी के लिबासों में
तुम्हीं आ कर हवाओं आज कुछ सरगोशियाँ रख दो
भला ये भी कहाँ मुमकिन कि मेरे दर्द को नापो
चलो हिस्से में मेरे और थोड़ी सिसकियाँ रख दो
सियासत कर रही खिलवाड़ जनता की उमीदों से
जलाकर मिन्नतों की अब 'प्रिया' सब अर्ज़ियाँ रख दो















