gham nahin hota hai azaadon ko besh az-yak-nafs | ग़म नहीं होता है आज़ादों को बेश अज़-यक-नफ़स

  - Mirza Ghalib

ग़म नहीं होता है आज़ादों को बेश अज़-यक-नफ़स
बर्क़ से करते हैं रौशन शम्-ए-मातम-ख़ाना हम

महफ़िलें बरहम करे है गंजिंफ़ा-बाज़-ए-ख़याल
हैं वरक़-गर्दानी-ए-नैरंग-ए-यक-बुत-ख़ाना हम

बावजूद-ए-यक-जहाँ हंगामा पैदाई नहीं
हैं चराग़ान-ए-शबिस्तान-ए-दिल-ए-परवाना हम

ज़ोफ़ से है ने क़नाअत से ये तर्क-ए-जुस्तुजू
हैं वबाल-ए-तकिया-गाह-ए-हिम्मत-ए-मर्दाना हम

दाइम-उल-हब्स इस में हैं लाखों तमन्नाएँ 'असद'
जानते हैं सीना-ए-पुर-ख़ूँ को ज़िंदाँ-ख़ाना हम

बस-कि हैं बद-मस्त-ए-ब-शिकन ब-शिकन-ए-मय-ख़ाना हम
मू-ए-शीशा को समझते हैं ख़त-ए-पैमाना हम

बस-कि हर-यक-मू-ए-ज़ुल्फ़-अफ़्शाँ से है तार-ए-शुआअ'
पंजा-ए-ख़ुर्शीद को समझे हैं दस्त-ए-शाना हम

मश्क़-ए-अज़-ख़ुद-रफ़्तगी से हैं ब-गुलज़ार-ए-ख़याल
आश्ना ताबीर-ए-ख़्वाब-ए-सब्ज़ा-ए-बेगाना हम

फ़र्त-ए-बे-ख़्वाबी से हैं शब-हा-ए-हिज्र-ए-यार में
जूँ ज़बान-ए-शम्अ' दाग़-ए-गर्मी-ए-अफ़्साना हम

शाम-ए-ग़म में सोज़-ए-इश्क़-ए-आतिश-ए-रुख़्सार से
पुर-फ़शान-ए-सोख़्तन हैं सूरत-ए-परवाना हम

हसरत-ए-अर्ज़-ए-तमन्ना याँ से समझा चाहिए
दो-जहाँ हश्र-ए-ज़बान-ए-ख़ुश्क हैं जूँ शाना हम

कश्ती-ए-आलम ब-तूफ़ान-ए-तग़ाफ़ुल दे कि हैं
आलम-ए-आब-ए-गुदाज़-ए-जौहर-ए-अफ़्साना हम

वहशत-ए-बे-रब्ती-ए-पेच-ओ-ख़म-ए-हस्ती न पूछ
नंग-ए-बालीदन हैं जूँ मू-ए-सर-ए-दीवाना हम

  - Mirza Ghalib

Friendship Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Mirza Ghalib

As you were reading Shayari by Mirza Ghalib

Similar Writers

our suggestion based on Mirza Ghalib

Similar Moods

As you were reading Friendship Shayari Shayari