hareef-e-matlab-e-mushkil nahin fusoon-e-niyaaz | हरीफ़-ए-मतलब-ए-मुश्किल नहीं फ़ुसून-ए-नियाज़

  - Mirza Ghalib

हरीफ़-ए-मतलब-ए-मुश्किल नहीं फ़ुसून-ए-नियाज़
दुआ क़ुबूल हो या रब कि उम्र-ए-ख़िज़्र दराज़

न हो ब-हर्ज़ा बयाबाँ-नवर्द-ए-वहम-ए-वजूद
हनूज़ तेरे तसव्वुर में है नशेब-ओ-फ़राज़

विसाल जल्वा तमाशा है पर दिमाग़ कहाँ
कि दीजे आइना-ए-इन्तिज़ार को पर्दाज़

हर एक ज़र्रा-ए-आशिक़ है आफ़ताब-परस्त
गई न ख़ाक हुए पर हवा-ए-जल्वा-ए-नाज़

न पूछ वुसअत-ए-मय-ख़ाना-ए-जुनूँ 'ग़ालिब'
जहाँ ये कासा-ए-गर्दूं है एक ख़ाक-अंदाज़

फ़रेब-ए-सनअत-ए-ईजाद का तमाशा देख
निगाह अक्स-फ़रोश ओ ख़याल आइना-साज़

ज़ि-बस-कि जल्वा-ए-सय्याद हैरत-आरा है
उड़ी है सफ़्हा-ए-ख़ातिर से सूरत-ए-परवाज़

हुजूम-ए-फ़िक्र से दिल मिस्ल-ए-मौज लरज़े है
कि शीशा नाज़ुक ओ सहबा-ए-आबगीन-गुदाज़

'असद' से तर्क-ए-वफ़ा का गुमाँ वो मा'नी है
कि खींचिए पर-ए-ताइर से सूरत-ए-परवाज़

हनूज़ ऐ असर-ए-दीद नंग-ए-रुस्वाई
निगाह फ़ित्ना-ख़िराम ओ दर-ए-दो-आलम बाज़

  - Mirza Ghalib

Aankhein Shayari

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    Mirza Ghalib
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    फिर वही पर्दा-ए-अमारी है

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    दिल ख़रीदार-ए-ज़ौक़-ए-ख़्वारी है

    वही सद-रंग नाला-फ़रसाई
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    महशरिस्तान-ए-सितान-ए-बेक़रारी है

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    फिर वही ज़िंदगी हमारी है

    फिर खुला है दर-ए-अदालत-ए-नाज़
    गर्म-बाज़ार-ए-फ़ौजदारी है

    हो रहा है जहान में अंधेर
    ज़ुल्फ़ की फिर सिरिश्ता-दारी है

    फिर दिया पारा-ए-जिगर ने सवाल
    एक फ़रियाद ओ आह-ओ-ज़ारी है

    फिर हुए हैं गवाह-ए-इश्क़ तलब
    अश्क-बारी का हुक्म-जारी है

    दिल ओ मिज़्गाँ का जो मुक़द्दमा था
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    बे-ख़ुदी बे-सबब नहीं 'ग़ालिब'
    कुछ तो है जिस की पर्दा-दारी है
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    Mirza Ghalib
    हुस्न-ए-मह गरचे ब-हंगाम-ए-कमाल अच्छा है
    उस से मेरा मह-ए-ख़ुर्शीद-जमाल अच्छा है

    बोसा देते नहीं और दिल पे है हर लहज़ा निगाह
    जी में कहते हैं कि मुफ़्त आए तो माल अच्छा है

    और बाज़ार से ले आए अगर टूट गया
    साग़र-ए-जम से मिरा जाम-ए-सिफ़ाल अच्छा है

    बे-तलब दें तो मज़ा उस में सिवा मिलता है
    वो गदा जिस को न हो ख़ू-ए-सवाल अच्छा है

    उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
    वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

    देखिए पाते हैं उश्शाक़ बुतों से क्या फ़ैज़
    इक बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है

    हम-सुख़न तेशा ने फ़रहाद को शीरीं से किया
    जिस तरह का कि किसी में हो कमाल अच्छा है

    क़तरा दरिया में जो मिल जाए तो दरिया हो जाए
    काम अच्छा है वो जिस का कि मआल अच्छा है

    ख़िज़्र-सुल्ताँ को रखे ख़ालिक़-ए-अकबर सरसब्ज़
    शाह के बाग़ में ये ताज़ा निहाल अच्छा है

    हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
    दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है
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    Mirza Ghalib

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