Shiv
Shiv
Ghazal

मर गए हम देख उस को यार दर पर

हैं खड़े ले कर सभी हथियार दर पर

बंदिशों में शख़्स जीए कब तलक ही
अंदरूँ है दफ़्न सारे वार दर पर

फ़र्क क्या जो लोग उस
में डूब जाएँ
रोज़ मिलती लाश इक दो चार दर पर

बंद कर दे याद करना हम अगर तो
छोड़ देता गुफ़्तगू से ग़ार दर पर

सब गिरेंगे हुस्न की जो बरतरी है
नाज़नीं को कर दिया तैयार दर पर

दिख रही है अक्स में वो महजबीं तो
क्या बताएँ किस क़दर है ख़्वार दर पर

हम बहाएँ अश्क, अपनी ख़ुद-कुशी पे
तुम करो तो हो भला इज़हार दर पर

ज़िन्दगी भी आफ़ियत से दूर गुज़री
शिव कभी ना कर सके इनकार दर पर

— Shiv

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