hama-tan gosh ik zamaana tha | हमा-तन गोश इक ज़माना था

  - Tabish Dehlvi

हमा-तन गोश इक ज़माना था
मेरे लब पर तिरा फ़साना था

काश दिल ही ज़रा ठहर जाता
गर्दिशों में अगर ज़माना था

हम थे और ए'तिमाद-ए-फ़स्ल-ए-बहार
शाख़ शाख़ अपना आशियाना था

वो बहारें भी हम पे गुज़री हैं
जब क़फ़स था न आशियाना था

दिल की उम्मीदवारियाँ न गईं
उस करम का कोई ठिकाना था

सुब्ह से पहले बुझ गया 'ताबिश'
एक दिल ही चराग़-ए-ख़ाना था

  - Tabish Dehlvi

Lab Shayari

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    देखना है कि तिलिस्म-ए-हस्ती
    किस से खुलता है अगर खुलता है

    दाव पर दैर-ओ-हरम दोनों हैं
    देखिए कौन सा घर खुलता है

    फूल देखा है कि देखा है चमन
    हुस्न से हुस्न-ए-नज़र खुलता है

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    मय-कदा शाम-ओ-सहर खुलता है

    छोटी पड़ती है अना की चादर
    पाँव ढकता हूँ तो सर खुलता है

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    Tabish Dehlvi
    ज़ेर-ए-लब रहा नाला दर्द की दवा हो कर
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    कर दिया तअ'य्युन से ज़ौक़-ए-इज्ज़ को आज़ाद
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    फ़र्त-ए-ग़म से बेहिस हूँ ग़म है ग़म न होने का
    दर्द कर दिया पैदा दर्द ने दवा हो कर

    हो चुके हैं सिल बाज़ू है न हिम्मत-ए-परवाज़
    हम रिहा न हो पाए क़ैद से रहा हो कर

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    दम लबों पे आता है हर्फ़-ए-मुद्दआ' हो कर

    ग़म पे ग़म मुझे दे कर ग़म से कर दिया महरूम
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